महाराष्ट्र में सियासी उलटफेर का असर बिहार पर भी पड़ा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में विभाजन के बाद बिहार में भी जनता दल-यू के टूटने की खबर तेजी से राजनीतिक गलियारे में फैल रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सियासी सरगर्मी के बाद अचानक सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने सबसे पहले अपनी पार्टी के विधायकों एवं सांसदों के साथ व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की है। उसके दूसरे दिन राज्यसभा के उप-चेयरमैन एवं जद(यू) के सांसद हरिवंश नारायण सिंह के साथ हुई मैराथन मुलाकात ने कई तरह की संभावनाओं को जन्म दे दिया है। राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा तेज है कि शायद नीतीश कुमार फिर से पलटी मार सकते हैं। नौकरी के बदले जमीन मामले में बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव सहित कुछ अन्य लोगों के नाम सीबीआई की चार्जशीट में आ जाने से राजनीतिक माहौल गर्मा गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव एवं राबड़ी देवी का नाम पहले ही अक्तूबर 2022 में चार्जशीट में शामिल कर लिया गया था। तेजस्वी का नाम चार्जशीट में शामिल होने से सुशासन बाबू के सामने विकट स्थिति पैदा हो गई है। तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने के सपने को भी धक्का लग सकता है। हालांकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के स्थापना दिवस पर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने नेताओं एवं कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि अगले चुनाव में विपक्ष भाजपा को पूरी तरह से शिकस्त देगा। भाजपा पहले ही महागठबंधन से मुकाबला के लिए कमर कस रही है। उपेन्द्र कुशवाहा पहले ही महागठबंधन से नाता तोड़कर अलग हो चुके हैं। देर-सबेर वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होंगे। बिहार के कोइरी मतदाताओं में कुशवाहा का अच्छा प्रभाव है। एक समय नीतीश के दाहिने हाथ समझे जाने वाले आरसीपी सिंह भाजपा में शामिल हो चुके हैं। कुशवाहा और आरसीपी सिंह के द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लव-कुश (कोइरी-कुर्मी) समीकरण को बिगाड़ने की कोशिश की जा रही है।

चिराग पासवान एवं जीतन राम माझी के सहारे भाजपा दलित वोटों पर दांव लगाने की तैयारी में है। बिहार में 6 प्रतिशत से ज्यादा दलित मतदाता चिराग पासवान के साथ हैं। अगर नीतीश कुमार अपना मन बदलते हैं तो फिर से नए समीकरण बन सकते हैं। राजद मुख्य रूप से यादव एवं मुस्लिम वोटों पर आधारित है। बिहार में इन दोनों जातियों का वोट प्रतिशत लगभग 35 प्रतिशत है। अगर कांग्रेस तथा वामदल भी राजद के साथ आते हैं तो बिना नीतीश के भी मुकाबला कांटे का होगा। अभी सब कुछ अधर में लटका हुआ है। अगले कुछ समय में बिहार की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट होगी कि कौन किसके साथ है? ऐसा लगता है कि बिहार में एनडीए के पुराने घटक दल एक मंच पर आ जाएंगे।