कभी किसी ने कहा था कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी की वजह से लड़ा जाएगा, उस समय किसी ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और इसे बकवास करार दिया था, परंतु इन दिनों देखा जा रहा है कि अकसर दो पड़ोसी राष्ट्र और देश में दो पड़ोसी राज्यों के बीच जल के बंटवारे को लेकर सदैव तानातनी बनी रहती है। खासतौर पर भारत के कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच काबेरी नदी के जल के बंटवारे को लेकर सदैव विवाद बना रहता है और दोनों सरकारों के बीच तल्ख बयानबाजी भी होती रहती है। इसी कड़ी में इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ईरान और अफगानिस्तान के बीच हेलमंद नदी के जल के बंटवारे को लेकर तानातनी की स्थिति बनी हुई है। दोनों देश हेलमंद नदी के पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से विवादों में उलझे हुए हैं। ईरान और तालिबान के बीच सीमा पर पिछले हफ्ते भारी गोलीबारी हुई। दोनों ओर से सैनिक मारे गए या घायल हो गए। इस टकराव से दोनों देशों के बीच तनाव गहरा गया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पहले गोलीबारी शुरू करने का आरोप लगाया। ये झड़पें ऐसे समय हुईं, जबकि हेलमंद नदी के पानी को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद जारी है। इस नदी का पानी दोनों देशों के लिए एक जीवंत स्रोत है, जो खेती, आजीविका और ईकोसिस्टम की बहाली में काम आता है।
अफगानिस्तान और ईरान सदियों से इस नदी के पानी के बंटवारे को लेकर टकराते रहे हैं। हेलमंद अफगानिस्तान की सबसे लंबी नदी है। पश्चिमी हिंदुकुश पर्वत शृंखला में काबुल के पास उसका उद्गम होता है और रेगिस्तानी इलाकों से होते हुए वह दक्षिण-पश्चिम दिशा में बहती है। 1,150 किलोमीटर लंबी हेलमंद नदी, हामन झील में गिरती है जो अफगानिस्तान-ईरान सीमा पर फैली हुई है। हामन झील ईरान में ताजे पानी की सबसे विशाल झील है। एक जमाने में यह दुनिया के सबसे बड़े वेटलैंडों में से एक थी। हेलमंद के पानी से भरी यह झील 4,000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है, लेकिन अब ये सिकुड़ रही है। विशेषज्ञ इसके लिए सूखे के अलावा बांधों और पानी पर नियंत्रण को जिम्मेदार मानते हैं। ये झील इलाकाई पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी अहमियत वाली है। दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर 1973 में हेलमंद नदी समझौता हुआ था, लेकिन संधि की न तो पुष्टि की गई और न ही पूरी तरह से अमल में आ पाई, जिसकी वजह से असहमतियां और तनाव पैदा हुए।
ईरान का आरोप है कि अफगानिस्तान उसके पानी के अधिकारों का वर्षों से हनन करता आ रहा है, उसकी दलील है कि 1973 के समझौते में पानी की जो मात्रा बांटने पर सहमति बनी थी, उससे बहुत कम पानी ईरान को मिलता है। अफगानिस्तान में ईरानी राजदूत हसन कजेमी कूमी ने सरकारी समाचार एजेंसी तस्नीम को पिछले हफ्ते दिए एक इंटरव्यू में कहा कि पिछले साल ईरान को अपने हिस्से का सिर्फ चार फीसदी पानी मिला था। अफगानिस्तान ने ईरान के आरोपों को खारिज करते हुए बताया है कि नदी का जलस्तर जलवायु से जुड़े कारणों की वजह से कम हुआ है, जैसे कि कम बारिश। हालात की जिम्मेदार यही वजहे हैं, जो ईरान के लिए चिंता का प्रमुख स्रोत हैं।
अफगानिस्तान में हेलमंद नदी के किनारों पर बांधों, जलाशयों और सिंचाई प्रणालियों का निर्माण. ईरान को डर है कि इन परियोजनाओं की वजह से उसके पास कम पानी बहकर आता है, लेकिन अफगानिस्तान की दलील है कि देश के भीतर पानी की किल्लत से निपटना और सिंचाई क्षमता को बढ़ाना उसका हक है। तेहरान का कहना है कि अफगानिस्तान में हेलमंद नदी पर बांधों के निर्माण से ईरान में पानी का बहाव कम होता है। ईरान और अफगानिस्तान के बीच जमीन पर 950 किलोमीटर लंबी सीमा है। दोनों देशों के बीच कोई खास क्षेत्रीय विवाद नहीं रहे हैं। अगस्त 2021 में जब अमरीकी और नाटो सेनाएं अफगानिस्तान छोड़ने के आखिरी चरण में थीं, तभी राजधानी काबुल पर तालिबानियों ने कब्जा कर लिया था। इससे पहले ईरान ने अफगानिस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाए हुए थे।