नवनिॢमत भव्य संसद भवन का उद्घाटन 28 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा होने जा रहा है। यह संसद भवन आधुनिक सुविधाओं से लैस है, जिसमें आगे की कार्य योजना को भी ध्यान में रखा गया है। अगर भविष्य में सांसदों की संख्या बढ़ती है तो भी कोई समस्या नहीं होगी। इस संसद भवन के उद्घाटन पर वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की छाया पडऩे लगी है। इसको लेकर सियासत जोरों पर है। विपक्षी पाॢटयां इस उद्घाटन को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने में लगी हैं। विपक्षी पाॢटयों का कहना है कि संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री की जगह राष्ट्रपति को करना चाहिए क्योंकि वे सर्वोच्च विधायी निकाय की प्रमुख हैं। उनको संसद का सत्र बुलाने, सत्रावसान करने तथा लोकसभा भंग करने का अधिकार है। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं संवैधानिक मर्यादा को देखते हुए नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों होना चाहिए।
अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील ने जनहित याचिका दायर कर इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। लोकसभा चुनाव नजदीक होने के कारण विपक्षी पाॢटयां मोदी सरकार को घेरने में लगी हुई हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), आम आदमी पार्टी (आप) जैसे पाॢटयों के कई नेता सीबीआई एवं ईडी के शिकंजे में फंसे हुए हैं। कुछ लोग हवालात में बंद हैं तो कुछ के खिलाफ जांच प्रक्रिया चल रही हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरङ्क्षवद केजरीवाल ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नया अध्यादेश को लेकर परेशान हैं। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने सेवाओं का नियंत्रण (ट्रांसफर एवं पोस्टिंग) का अधिकार दिल्ली के उप राज्यपाल से लेकर निर्वाचित मुख्यमंत्री को देने का निर्देश दिया था।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए नया अध्यादेश जारी कर दिया है। इसको लेकर अरङ्क्षवद केजरीवाल विपक्षी दलों को राज्यसभा में वोङ्क्षटग के लिए अपने पक्ष में लामबंद करने में लगे हुए हैं। विभिन्न कारणों से मोदी सरकार से नाराज विपक्षी दल संसद भवन के उद्घाटन के मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं। इन दलों ने उद्घाटन समारोह को बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। बहिष्कार करने वालों में कांग्रेस, टीएमसी, एनसीपी, शिवसेना (उद्धव) डीएमके एआईएमएआईएम, आप, भाकपा, समाजवादी पार्टी (सपा), आरजेडी एवं जदयू शामिल है। हालांकि कांग्रेस में बहिष्कार को लेकर दो तरह की विचारधारा सामने आ रही हैं। सपा के नेता रामगोपाल यादव भी बहिष्कार के पक्ष में नहीं हैं। दूसरी तरफ भाजपा के साथ-साथ कुछ अन्य विपक्षी पाॢटयां भी उद्घाटन के मुद्दे पर सरकार के साथ खड़ी हैं। तेलगु देशम पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल जैसी पाॢटयां प्रधानमंत्री से उद्घाटन कराने का समर्थन कर रही हैं।
आम आदमी पार्टी ने तो इस मुद्दे को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से जोड़ दिया है। केजरीवाल ने एससी व एसटी कार्ड खेलते हुए कहा है कि नए संसद भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से करना चाहिए। कुल मिलाकर संसद भवन के उद्घाटन को लेकर पक्ष-विपक्ष के बीच सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। हालांकि भाजपा का कहना है कि इससे पहले भी संसद भवन से संबंधित कई भवनों का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री के द्वारा किया गया है, जो कांग्रेस पार्टी से थे। इसमें पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन ङ्क्षसह ने भी अपने समय में इस तरह का उद्घाटन किया था।
ऐसी स्थिति में कांग्रेस को दोहरी नीति नहीं अपनानी चाहिए। भाजपा का यह भी कहना है कि प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व का लोहा दुनिया मानती है। हाल ही में जापान, पापुआ न्यू गिनी व आस्ट्रेलिया की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को दुनिया ने देखा है। जहां पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री ने पैर स्पर्श कर मोदी से आशीर्वाद लिया, वहीं आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने उनको बॉस तक कह डाला। ऐसी स्थिति में विपक्ष को संसद भवन के उद्घाटन को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए। अब देखना है कि विपक्ष इस मुद्दे को उछाल किस हद तक राजनीतिक लाभ हासिल कर सकती है।