कर्नाटक विधानसभा चुनाव-2023 के नतीजे कांग्रेस  के लिए  संजीवनी से कम नहीं है, जो पार्टी में जान और ऊर्जा डालने का काम करेगी, वहीं बीजेपी के लिए चुनाव में हार किसी सदमे जैसा है। कर्नाटक में कांग्रेस की जीत राज्य की उस 38 साल की परंपरा का भी दोहराव है, जिसमें 1985 के बाद कोई सरकार रिपीट नहीं हुई है। दूसरी ओर  पीएम मोदी ने कर्नाटक चुनाव में जीत पर कांग्रेस पार्टी को दी बधाई दी। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के कारणों की जितनी चर्चा हो रही है, उतनी ही या उससे ज्यादा चर्चा भाजपा की हार की हो रही है।

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने बीएस येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाया। कर्नाटक में उनसे बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार करवाया, लेकिन जिस तरह से उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया,उससे लिंगायत वोटों की नाराजगी बढ़ी। ये नाराजगी चुनाव में भारी पड़ी। मतदाताओं में यह संदेश गया कि येदियुरप्पा पार्टी की अंदरूनी राजनीति में अपने विरोधी और ताकतवर नेता बीएल संतोष के शिकार बने। लिंगायत बहुल सीटों पर कांग्रेस की बड़ी जीत बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है। दूसरी ओर भाजपा उन नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती नहीं दिखी,जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। पार्टी ने ईश्वरप्पा का टिकट जरूर काटा,लेकिन उनसे दूरी न बनाकर इस मुद्दे पर कांग्रेस को आक्रामक होने का मौका दे दिया।

कांग्रेस 40 प्रतिशत कमीशन की सरकार का लेबल बीजेपी पर चिपकाने में कामयाब रही। भाजपा कांग्रेस के सधे चुनावी अभियान का स्थानीय स्तर पर मुकाबला करने में नाकाम रही। कांग्रेस स्थानीय मुद्दों पर हावी रही। बीजेपी इसके मुकाबले राष्ट्रीय और सांप्रदायिक मुद्दे उछालती रही। बीजेपी ने अपना घोषणा-पत्र लाने में बहुत देरी की, तब तक कांग्रेस अपनी पांच गारंटियों को जनता तक पहुंचा चुकी थी। यहां की भाजपा सरकार के 11 मंत्री और कई विधायक चुनाव हार गए। यह सरकार के प्रति लोगों के गुस्से का सबूत है। बीजेपी एंटी-इंकमबेंसी का मुकाबला नहीं कर सकी। चुनाव से पहले यह मांग उठी थी कि बीजेपी गुजरात मॉडल को लागू करते हुए बड़ी संख्या में विधायकों के टिकट काटे, लेकिन इसे नहीं माना गया। 

बीजेपी विधानसभा चुनाव को भी मोदी बनाम राहुल कर राष्ट्रीय स्वरूप देने की रणनीति पर काम करती है। इसी तरह बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को मोबेलाइज कर मतदाताओं को वोट देने के लिए लाती है, लेकिन इस माइक्रो-मैनेजमेंट पर कांग्रेस का वोकल फॉर लोकल भारी पड़ा।  टिकट बंटवारे में गड़बड़ी, अंदरूनी राजनीति, भीतरघात बीजेपी के खिलाफ गया, वहीं, कांग्रेस स्थानीय मुद्दों से टस से मस नहीं हुई। राहुल गांधी भी अपने प्रचार में राष्ट्रीय मुद्दों को तूल देने से बचे। चुनाव को मोदी बनाम राहुल बनने से कांग्रेस ने बखूबी रोक दिया।  दूसरी ओर  इस परिणाम के साथ ही 2024 के लोकसभा चुनाव की बिसात बिछ गई है।

विपक्षी एकता की कोशिश कर रहे नेता नतीजों के बाद इसे 2024 के आम चुनाव से जोड़ते हुए उम्मीद कर रहे हैं कि आगे भी ऐसा ही होगा। चुनाव परिणाम आने के बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, शिवसेना नेता संजय राउत और एनसीपी चीफ शरद पवार ने कहा कि ये 2024 की शुरुआत है, वहीं कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी कहा कि यह एक स्पष्ट संदेश है। हम कर्नाटक के गरीब लोगों के साथ खड़े थे। 

 भाजपा कर्नाटक के अमीरों के साथ थी। गरीबों ने इस चुनाव को जीत लिया। यह परिणाम 2024 के लिए मील का पत्थर है। दरअसल आए दिन विपक्षी दल एकजुटता की कोशिश कर रहे हैं ताकि बीजेपी के खिलाफ मिलकर लड़ सकें।  इसको लेकर हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनसीपी चीफ शरद पवार, अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी सहित कई नेताओं से मुलाकात की थी। अब देखना है कि विपक्ष कर्नाटक चुनाव के बाद कितने उत्साह के साथ 2024 में भाजपा को मात देने के लिए कार्य करता है।