भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना अपने-अपने तरीके से हर आस्थावान धर्मावलम्बी पुण्य अॢजत करने के लिए करते हैं। तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में शिवजी की महिमा अपरम्पार है। जिसके फलस्वरूप भगवान शिवजी को देवाधिदेव महादेव माना गया है। इनकी कृपा से जीवन में भौतिक सुख, ऐश्वर्य, वैभव व सौभाग्य की प्राप्ति होती है। भगवान शिवजी की विशेष अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए शिवपुराण में विविध व्रतों का उल्लेख है, जिसमें प्रदोष व्रत अत्यंत प्रभावशाली तथा शीघ्र फलदाई माना गया है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि यह प्रदोष व्रत प्रत्येक मास में दो बार आता है। शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन यह व्रत रखा जाता है। सूर्यास्त की समाप्ति एवं रात्रि के प्रारंभ में पडऩे वाली त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है।
सूर्यास्त के बाद तीन मुहूर्तपर्यन्त जो त्रयोदशी तिथि हो, उसी दिन यह व्रत रखा जाता है। सायंकाल प्रदोषकाल में भगवान् शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना का नियम है। ज्योतिषविद् ने बताया कि इस बार यह प्रदोष व्रत 3 मई, बुधवार को रखा जाएगा। वैशाख शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 2 मई, मंगलवार को रात्रि 11 बजकर 19 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 3 मई, बुधवार की रात्रि 11 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। हस्त नक्षत्र 2 मई, मंगलवार को रात्रि 7 बजकर 41 मिनट पर लगेगा, जो कि 3 मई, बुधवार रात्रि 8 बजकर 57 मिनट तक रहेगा।
जिसके फलस्वरूप प्रदोष व्रत 3 मई, बुधवार को रखा जाएगा। प्रदोषकाल का समय सूर्यास्त से 48 मिनट या 72 मिनट तक माना गया है, इसी अवधि में भगवान् शिवजी की पूजा प्रारंभ करनी चाहिए। व्रतकर्ता को इस दिन सम्पूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुन: स्नान करने के उपरान्त स्वच्छ व धारण करना चाहिए तत्ïपश्चातï् प्रदोष बेला में भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए। ऐसे रखें प्रदोष व्रत : ज्योतिषविद् ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान-ध्यान, पूजा-अर्चना के पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए।