भारतीय राजनीति में माफियाओं एवं बाहुबलियों का लगातार वर्चस्व रहा है। इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी एवं कुछ अन्य बाहुबलियों का उत्तर प्रदेश की राजनीति में दबदबा रहा है। योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद बाहुबलियों के खिलाफ जो अभियान शुरू हुआ है, उसके तहत अतीक अहमद सहित कई बाहुबली एवं उनके गुर्गे मारे जा चुके हैं या जेल की हवा खा रहे हैं। योगी सरकार माफियाओं के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के माफिया त्राहिमाम कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि बिहार की नीतीश कुमार की सरकार एक बार फिर से माफियाओं के सहारे चुनाव जीतने की नीति पर आगे बढ़ रही है।

बिहार के बाहुबली आनंद मोहन की रिहाई इसी रूप में देखी जा रही है। नीतीश सरकार ने अपने जेल नियमावली में संशोधन कर आनंद मोहन के रिहाई का रास्ता प्रशस्त कर दिया। इसीके तहत 27 अप्रैल को आनंद मोहन जेल से बाहर आ गए। बिहार जेल नियमावली में एक अनुच्छेद था जिसके तहत लोकसेवकों की हत्या के आरोपी को कम से कम 20 साल तक जेल की सजा काटनी ही होगी। बिहार सरकार ने इसी अनुच्छेद को हटाकर आनंद मोहन को जेल से निकालने का रास्ता साफ कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि आनंद मोहन की रिहाई के लिए जेल से और 26 खूंखार अपराधियों को छोडऩा पड़ा है, जिनके ऊपर हत्या, बलात्कार, डकैती सहित कई तरह के गंभीर धारा के तहत केस दर्ज है। मालूम हो कि आनंद मोहन अभी 15 साल तक ही जेल की सजा काटे थे। बिहार सरकार के इस कदम से वहां सियासत भी गर्म हो गया है। भाजपा, बहुजन समाज पार्टी एवं आईएएस एसोसिएशन इसका विरोध कर रहा है। भाजपा में भी आनंद मोहन की रिहाई को लेकर दो तरह की विचारधारा सामने आई है।

आनंद मोहन पांच नवंबर 1994 को गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृृष्णैया की हत्या के आरोपी हैं। उन पर भीड़ को हत्या के लिए उकसाने का आरोप है। इनके उकसाने पर ही भीड़ ने पीट पीटकर कृृष्णैया की हत्या कर दी थी। मालूम हो कि कृृष्णैया बिहार के दूसरे बाहुबली कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला के अंतिम संस्कार में भाग लेने गए थे। एक दिन पहले छोटन शुक्ला की हत्या हो गई थी। निचली अदालत ने वर्ष 2007 में आनंद मोहन को फांसी की सजा दी थी,पटना हाई कोर्ट ने फांसी की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया था। आनंद मोहन देश के ऐसे राजनीतिज्ञ थे जिन्हें फांसी की सजा मिली थी। ऐसी खबर है कि नीतीश कुमार तेजस्वी यादव के दबाव में यह कठिन फैसला लिया है। आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद राजद से विधायक हैं। बिहार में नीतीश सरकार ने जातिगत जनगणना शुरू की है जिससे वहां के सवर्ण वर्ग नाराज बताए जाते हैं। नीतीश सरकार ने आनंद मोहन की रिहाई करवाकर सवर्णों खासकर राजपूत समुदाय का समर्थन हासिल करने का भरसक प्रयास किया है।

बिहार में लगभग 18 प्रतिशत सर्वण हैं, जिसमें 7 प्रतिशत राजपूत समुदाय के मतदाता हैं। बिहार के 30-35 विधानसभा क्षेत्र एवं 6-7 लोकसभा क्षेत्र में राजपूत मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन का राजपूत मतदाताओं पर कितना प्रभाव होगा, यह देखना बाकी है। आनंद मोहन 1974 में बिहार में शुरू हुए जेपी आंदोलन में शामिल हुए थे और 1990 में बिहार में इनकी तूती बोलती थी। शुरू में आनंद मोहन लालू यादव के विरोधी तबके में शामिल थे। 1993 में सहरसा के महिसी विधानसभा क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर जीत मिली थी। जेल में रहते हुए 1996 एवं 1998 में शिवहर लोकसभा क्षेत्र से आनंद मोहन को जीत मिली थी। अब यह मामला पटना हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। अब देखना है कि हाई कोर्ट इस मामले में क्या निर्णय देता है? कुल मिलाकर आनंद मोहन की रिहाई से अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।