भूटान के प्रधानमंत्री लोटे शेरिंग की डोकलाम के बारे में की गई टिप्पणी को पड़ोसी देश चीन के करीब जाने के रूप में देखा गया। शेरिंग ने एक साक्षात्कार में कहा था कि डोकलाम विवाद को सुलझाने में भारत और भूटान के साथ चीन की बराबर की भूमिका है। बातचीत के द्वारा इस समस्या का हल निकाल लिया जाएगा। भूटानी प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद नई दिल्ली में हड़कंप मचना स्वाभाविक था। नई दिल्ली के एक्शन में आने के बाद भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांग्चुक भारत के दौरे पर पहुंच गए। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय एवं सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।
भूटान नरेश ने स्वीकार किया कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक विकास गठजोड़ आपसी समझ और विश्वास पर आधारित मित्रता एवं सहयोग के मजबूत संबंधों को प्रदर्शित करता है। शेरिंग की टिप्पणी को लेकर नई दिल्ली के समक्ष कुछ चिंताएं थीं जिसको भूटान नरेश के समक्ष उठाया गया। हालांकि भूटान नरेश ने स्पष्ट किया है कि डोकलाम के मुद्दे पर भूटान की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति भवन में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति मुर्मू ने भी कहा कि भारत और भूटान के बीच आपसी विश्वास, सौहार्द्र और समझ के आधार पर सभी स्तरों पर करीबी गठजोड़ है। भूटान भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश है। पिछले कुछ वर्षों से दोनों देशों के बीच सुरक्षा संबंधों में तेजी से विस्तार हुआ है।
वर्ष 2017 में डोकलाम में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 73 दिनों तक टकराव की स्थिति बनी रही। डोकलाम भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से अहम क्षेत्र है। वर्ष 2017 में डोकलाम ट्राई जंक्शन पर तब विवाद शुरू हुआ जब चीन उस क्षेत्र में सड़क विस्तार की कोशिश में लगा हुआ था। भूटान का कहना था कि वह क्षेत्र उसका है। भूटान की अपील पर भारत ने अपनी सेना भेजी थी, क्योंकि वहां भारत का राष्ट्रीय हित भी जुड़ा हुआ था। मालूम हो कि चीन और भूटान के बीच 400 किलोमीटर लंबी सीमा है। चीन भूटान को अपने पाले में कर डोकलाम क्षेत्र को हड़पना चाहता है। अगर ऐसा हुआ तो यह भारत के लिए खतरे की घंटी है, क्योंकि पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा।
राजनयिक संबंध नहीं होने के बावजूद चीन ने भूटान के साथ सीमा विवाद के समाधान के लिए भारत को छोड़कर अनेक दौर की वार्ता आयोजित की है। चीन ने भूटानी सीमा के पास कई गांव भी बसा लिए हैं। ऐसी स्थिति में भारत को कड़ा रुख अपनाना पड़ा है। भूटानी नरेश की भारत यात्रा के दौरान स्वास्थ्य, शिक्षा, कृृषि, आधारभूत ढाचा, कौशल विकास आदि क्षेत्रों में कई समझौते पर हस्ताक्षर भी किए गए। भारत और भूटान ने ऊर्जा सहयोग पर भी सहमति व्यक्त की। दोनों पक्षों ने कोकराझाड़ (असम) और गेलेफू (भूटान) के बीच प्रस्तावित रेल लिंक को गति प्रदान करने पर भी सहमति व्यक्त की। कोरोना काल के दौरान पर्यटकों की संख्या में आई कमी से भूटान की अर्थ-व्यवस्था प्रभावित हुई है। ऐसा लगता है कि भूटान सकारात्मक बयान देकर चीन को खुश करने का प्रयास किया हो, ताकि उसे आर्थिक मदद मिल सके। यही कारण है कि भारत ने भूटान नरेश की झोली में कई सौगातें डाल दी, किंतु साथ में भूटान को सावधान भी किया कि वह चीन के जाल में न फंसे। भारत को इस मामले में हमेशा सतर्क रहना पड़ेगा।