इन दिनों पूरी दुनिया आर्थिक संकट की ओर बढ़ रही है। कई देशों में लोगों को भोजन तक नहीं मिल रहा है। हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान भी इसका उदाहरण है। यूरोप के कई देश आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। कई नामी-गिरामी बैंक दिवालिया हो चुके हैं। विकासशील देशों में आयात बढ़ रहे हैं और निर्यात घट रहा है। नौकरियों के लाले पड़े हुए हैं। इसी बीच अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि 2023 में वैश्विक आर्थिक विकास दर 3 फीसदी के नीचे रहेगी। फिलहाल विकास दर ऐतिहासिक रूप से कमजोर है और आने वाले कई साल तक ऐसा रह सकता है। इस विकास का आधा हिस्सा सिर्फ चीन और भारत से आ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक दुनिया के 90 फीसदी विकसित देशों में विकास दर धीमी पड़ रही है और बढ़ती ब्याज दरों का असर मांग पर दिखाई दे रहा है। बहुत ही जल्द मुद्रा कोष अपना नया आर्थिक अनुमान जारी करेगा।
जनवरी में उसने अनुमान जाहिर किया था कि 2023 में वैश्विक विकास दर 2.9 फीसदी रह सकती है जो कि पिछले साल से करीब 0.5 फीसदी कम होगी। यूक्रेन युद्ध और बढ़ती महंगाई दर को इसकी मुख्य वजह बताया गया था। 2022 में वैश्विक विकास दर 3.4 फीसदी रही थी। चूंकि वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ रहा है और मुद्रास्फीति पहले से ही ऊंची दर पर है तो अर्थव्यवस्था में वापसी अभी नजर नहीं आ रही है। वर्तमान में केंद्रीय बैंकों की ओर से अपनाई सख्त मौद्रिक नीति तारीफ योग्य है और उन्हें मुद्रास्फीति से लड़ने के लिए इसे बनाए रखना चाहिए। राहत की बात है कि आज बैंक पहले से ज्यादा मजबूत और सक्षम हैं और नीति-निर्माताओं ने हाल के हफ्तों में तेजी से हालात को संभाला है।
पिछले कई महीनों से केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में लगातार वृद्धि कर रहे हैं। अमरीका समेत अधिकतर देशों में ब्याज दरें इस वक्त ऐतिहासिक रूप से सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी हैं, लेकिन फरवरी में अमरीका के सिलिकन वैली बैंक के धराशाही होने के बाद अधिक ब्याज दरों को लेकर चिंता बढ़ गई है। फिर भी,आईएमएफ चाहता है कि ब्याज दरों में वृद्धि जारी रहनी चाहिए। जरूरी है कि इस वक्त मुद्रास्फीति को रोकने के कदमों से पीछे हटा जाए। इससे कहीं ज्यादा जटिल और मुश्किल वक्त में उन्हें इस रास्ते पर चलते रहना होगा। बैंकिग क्षेत्र में सबसे बड़ा झटका स्विट्जरलैंड के विशालकाय बैंक क्रेडिट स्विस के बंद होने से लगा,जिसे नियामकों के दखल के बाद अन्य बैंक यूबीएस में मिला दिया गया क्योंकि उसकी वित्तीय सेहत को लेकर चिंता बनी हुई थी। लेकिन केंद्रीय बैंकों की प्राथमिकता अभी भी मुद्रास्फीति से लड़ना और विभिन्न उपायों के जरिए वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना होना चाहिए।
अमरीका और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव वैश्विक आर्थिक विकास की राह में बड़ी बाधा है। लंबे समय तक आर्थिक फैसले लागत के आधार पर होते रहे हैं लेकिन अब ऐसा नहीं है। आज अमरीका और कई अन्य देश भी सप्लाई की सुरक्षा चाहते हैं और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को तरजीह दे रहे हैं। सवाल है कि वे किस हद तक जाते हैं।बिना विकास की नींव को कमजोर किए भी ऐसा करना संभव है। अगर ऐसा लंबे समय तक जारी रहता है तो आर्थिक उत्पादन के सात फीसदी तक का नुकसान हो सकता है। मौजूदा हालात से गरीब देशों को दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है। एक तो कर्ज महंगा हो रहा है और उनके निर्यात की मांग भी कम हो रही है। इस कारण गरीबी और भुखमरी बढ़ सकती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वर्तमान में पूरी दुनिया की स्थिति भयावह है। ऐसी स्थिति में जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले रुस- यूक्रेन युद्ध को रोका जाए, जिसके कारण नए संकट खड़े हो गए हैं।