देश में राजनेताओं एवं विभिन्न धर्मों के धर्माचार्यों द्वारा पिछले कुछ वर्षों से भड़काऊ एवं नफरती भाषणों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इस तरह के भाषणों से दिन-प्रतिदिन समस्या और गंभीर होती जा रही है। इसका प्रभाव संप्रदायिक सद्भाव एवं राष्ट्रीय एकता पर पड़ रहा है, जो देश के लिए बहुत ही खतरनाक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश केएम जोसेफ एवं न्यायाधीश बीवी नागरत्ना की खंडपीठ ने कहा कि इस संबंध में केवल एफआईआर दर्ज करने से काम नहीं चलेगा। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि इस संबंध में एफआईआर दर्ज होने के बाद केंद्र द्वारा किस तरह की कार्रवाई करने की योजना है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले भी चेतावनी दिए जाने के बावजूद भड़काऊ भाषणों की संख्या में कमी नहीं आ रही है।
कोर्ट में याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया है कि पिछले चार महीनों के दौरान महाराष्ट्र में 50 रैलियों में कई नफरती भाषण दिए गए। इस तरह की बयानबाजी से लोकतंत्र की आत्मा पर चोट पहुंचती है। कोर्ट ने कहा है कि हम चुपचाप हैं इसका मतलब यह नहीं है कि हमें इसके बारे में जानकारी नहीं है। राजनीति और धर्म को अलग-अलग कर दिया जाए तो इस तरह की समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। धर्म और राजनीति को अलग-अलग देखने की जरुरत है। कोर्ट ने पंडित जवाहर लाल नेहरु एवं अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके भाषण सुनने के लिए लोग दूर-दूर से इकट्ठे होते थे। विभिन्न राजीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं द्वारा संप्रदायिक एवं नफरती भाषण देने से अब इस मामले को नए सिरे से परिभाषित करने की जरुरत आ पड़ी है।
इस पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कानून बनाने की जरुरत है। चुनावी रैलियों के दौरान राजनेताओं द्वारा एक-दूसरे पर ऐसी ओछी आरोप लगाये जाते हैं, जिसे किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता है। विभिन्न चैनलों द्वारा आयोजित टीवी परिचर्चा के दौरान राजनेता भाषा की मर्यादा भी भूल जाते हैं, जो लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में धर्म का उपयोग बंद करने की जो नसीहत दी है, उस पर राजनीतिक दलों को अमल करना चाहिए। कोर्ट का कहना था कि अदालतें कितने लोगों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करेगी? इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा, तभी जाकर इस तरह की प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकता है। कानून में कड़े प्रावधान होने से राजनेता या धार्मिक नेता भड़काऊ बयान देने से बचेंगे।
नफरती बयान से समाज पर विपरीत असर पड़ता है तथा लोगों के बीच अविश्वास का वातावरण बनता है। इस तरह के बयान सांप्रदायिक तनाव के कारण बनते हैं, जो देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न करते हैं। सभी पक्षों को मिलकर इस दिशा में आगे आने की जरुरत है ताकि इसका कोई ठोस हल निकल सके। अगर राजनेता ही अपनी जबान पर नियंत्रण कर लें तो बहुत-सी समस्याओं का हल अपने आप निकल सकता है। राजनेताओं द्वारा भड़काऊ बयान देने के कारण कई बार देश और समाज में संघर्ष की स्थिति बन जाती है, जिससे काफी नुकसान होता है। नेताओं के बयान के कारण समय-समय पर टकराव की स्थिति बनती है, जो हिंसक रूप ले लेती है। इस तरह की घटनाओं में सरकारी संपत्ति के नुकसान के साथ-साथ जान की भी हानि होती है। देश में अशांति होने से इसका विपरीत प्रभाव विदेशों में पड़ता है। बाहर से पूंजी निवेश के लिए देश में शांति का माहौल रहना जरूरी है। इसके लिए सरकार, राजनीतिक पार्टियों एवं जनता को मिलकर प्रयास करना होगा। केवल चुनाव जीतने की राजनीति को लेकर राष्ट्रहित के खिलाफ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट की पहल से नेताओं के भड़काऊ भाषणों पर अंकुश लगेगा।