वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस तथा भाजपा से समान दूरी रखने वाली राजनीतिक पार्टियों को लेकर तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव तथा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर मंत्रणा हुई है। सपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों की तरफ से कहा गया है कि भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी वाली पार्टियों के साथ बातचीत की जाएगी, जिसमें क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। मालूम हो कि सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कोलकाता में आयोजित की गई।

उस बैठक के बाद दोनों पार्टियों की बैठक हुई है जिसमें भाजपा को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर विचार हुआ। अखिलेश यादव ने तो स्पष्ट रूप से कहा है कि 2024 में हमलोग भाजपा का सूपड़ा साफ कर देंगे। ऐसी खबर है कि दोनों नेता उन आठ विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने का प्रयास करेंगे जिनके नेताओं ने 5 मार्च को केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा था। इस पत्र में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के मामले का हवाला दिया गया था। इन आठ दलों में कांग्रेस शामिल नहीं थी। अगर सभी आठों दलों की सहमति बन जाती है तो इन दलों के प्रमुख बैठक में शामिल हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीआरएस, राष्ट्रीय जनता दल, सपा, एनसीपी तथा शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता बैठक में शामिल हो सकते हैं। यह सबको मालूम है कि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार होंगे। कांग्रेस ने पहले से ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करना शुरू कर दी है। प्रश्न यह उठता है कि कांग्रेस के बिना तीसरे मोर्चे का गठबंधन कितना कामयाब होगा? कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने कहा है कि कांग्रेस के बिना कोई भी फ्रंट संभव नहीं होगा जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनौती दे सके। किसी भी विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस की अहम् भूमिका होगी। इस बात पर संशय बना हुआ है कि अगर तीसरा मोर्चा बनता है तो प्रधानमंत्री पद के लिए कौन चेहरा होगा?

अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, शरद पवार, चन्द्रशेखर राव पहले ही अपने को इस रेस में शामिल कर चुके हैं। ऐसी स्थिति में आम सहमति बनना मुश्किल लग रहा है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनाव के बाद इसका निर्णय कर लिया जाएगा। देश की जनता बिना चेहरे वाले विपक्षी गठबंधन को कितना स्वीकार कर पाएगी यह भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है। मोदी जैसे दमदार चेहरा के सामने विपक्ष का मजबूत चेहरा नहीं होने से जनता का विश्वास निश्चित रूप से डगमगाएगा जो विपक्ष के हित में नहीं होगा। पहले का चुनाव परिणाम भी इसका जीता-जागता उदाहरण है। दूसरी तरफ भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अभी से ही कमर कस चुकी है। पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में मिली सफलता के बाद पार्टी ने अपना ध्यान कर्नाटक पर केंद्रित कर दिया है। वर्ष 2023 में होने वाले नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव में परचम फहरा कर भाजपा लोकसभा चुनाव में अपनी दावेदारी और मजबूत करना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा उनकी टीम इस मुहिम में पूरी तरह जुट गई है।