नेपाल में राष्ट्रपति के चुनाव में चीन को करारा झटका लगा है। चीन समर्थित सीपीएन-यूएमएल के उम्मीदवार की करारी हार ने नेपाल में सत्ता के नए समीकरण का संकेत दिया है। राष्ट्रपति चुनाव में नेपाली कांग्रेस के उम्मीदवार रामचन्द्र पौडेल ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की है। पौडेल को प्रधानमंत्री पुष्प दहल कमल उर्फ प्रचंड की पार्टी के साथ-साथ कुल आठ दलों का समर्थन प्राप्त था जबकि ओली के उम्मीदवार को केवल चार दलों का ही समर्थन मिला था। प्रचंड सरकार की पहल से क्षुब्ध होकर ओली ने प्रचंड सरकार से अपना समर्थन भी वापस ले लिया है। लेकिन प्रचंड सरकार की सेहत पर कोई खतरा नहीं है।

275 सदस्यीय नेपाली संसद में बहुमत के लिए 138 सदस्यों का समर्थन चाहिए। नेपाली कांग्रेस के पास 89, सीपीएन-एमसी के पास 32, माधव नेपाल की यूनीफाइड सोशलिस्ट के पास 10 तथा राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के पास 20 सदस्य हैं। और छोटी-छोटी पार्टियों का प्रचंड सरकार को समर्थन प्राप्त है। वर्तमान अंक के अनुसार प्रचंड सरकार को बहुमत से बहुत ज्यादा सांसदों का समर्थन प्राप्त है। चीन के इशारे पर ओली ने प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन-एमसी के साथ गठबंधन दल की दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन कर नेपाली कांग्रेस को हाशिये पर धकेल दिया था। ओली चाहते थे कि प्रचंड सरकार चीन की गोद में बैठ जाए, किंतु प्रचंड भारत और चीन दोनों के साथ बराबर का संबंध बनाना चाहते थे।

यही कारण है कि दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों का बेमेल गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया। ओली चीन के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। उनके शासन में भारत और नेपाल के संबंध निचले स्तर पर आ गए थे। ओली ने भारत के तीन इलाकों को नेपाल के नए मानचित्र में शामिल कर तनाव बढ़ा दिया था। भारत द्वारा कैलाश पर्वत तक निर्माणाधीन सड़क पर आपत्ति कर ओली ने यह दर्शा दिया कि वे वास्तव में भारत विरोधी हैं। चीन द्वारा नेपाल की जमीन हड़पने को नजरअंदाज कर ओली ने अपने शासन में चीनी निवेश को बढ़ावा दिया। ओली के शासन में अमरीका के साथ भी नेपाल के संबंध खराब हो गए थे। ओली ने अमरीका की वित्तीय मदद को तकनीकी पेच फंसाकर रोक दिया था।

वर्ष 2017 में मेलेनियम चैलेज कॉरपोरेशन ने नेपाल को 50 करोड़ डॉलर की सहायता देने की सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन ओली ने इसमें भी अड़ंगा लगा दिया था। उम्मीद है कि ओली के सत्ता से बाहर होने के बाद भारत और नेपाल के संबंधों में मजबूती आएगी। अग्निवीर योजना के तहत 25 हजार नेपाली युवकों को सेना में भर्ती करने का मामला फिर से आगे बढ़ेगा, जो अभी अधर में लटका हुआ है। सबको मालूम है कि अमरीका कुछ मामलों में वित्तीय मदद अनुदान या निःशुल्क रूप से करता है, किंतु चीन अपने वित्तीय सहायता को कर्जजाल में तब्दील कर कर्जदार देशों को अपना गुलाम बनाने लगता है। श्रीलंका और पाकिस्तान के उदाहरण सबके सामने है। दोनों ही देश दिवालिया होने के कगार पर हैं। नेपाल भारत के लिए सामरिक एवं भौगोलिक दोनों ही दृष्टिकोण से काफी अहम् है। स्थिर सरकार होना भारत के पक्ष में होगा। वर्तमान राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी का कार्यकाल 14 मार्च को समाप्त हो रहा है। रामचन्द्र पौडेल के राष्ट्रपति बनने से नेपाल में चीन का हस्तक्षेप कम होगा एवं भारत का दबदबा बढ़ेगा। भारत और नेपाल के बीच सदियों से बेटी-रोटी का संबंध रहा है। मधुर संबंध दोनों देशों के हित में है। उम्मीद है कि प्रचंड और नेपाली कांग्रेस के हाथ मिलाने से नेपाल में सत्ता के नए समीकरण की शुरुआत होगी। प्रधानमंत्री प्रचंड को ओली की साजिश के प्रति सावधान रहना पड़ेगा।