समस्त शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व सर्वप्रथम मंगलमूर्ति श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना करने का विधान है। सनातन हिन्दू धर्मशास्त्रों में भगवान श्रीगणेशजी की महिमा अनंत है। सुख-समृद्धि के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखने की धार्मिक परंपरा है। संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत इस बार शनिवार, 11 मार्च को रखा जाएगा। गौरीनंदन भगवान श्रीगणेश जी को चतुर्थी तिथि समर्पित है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि प्रत्येक माह के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। चैत्र कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि शुक्रवार, 10 मार्च को रात्रि 9 बजकर 43 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन शनिवार, 11 मार्च को रात्रि 10 बजकर 06 मिनट तक रहेगी।
चंद्रोदय रात्रि 9 बजकर 35 मिनट पर होगा। फलस्वरूप संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत शनिवार, 11 मार्च को रखा जाएगा। रात्रि में चंद्र उदय होने के पश्चात् चंद्रमा को अर्घ्य देकर उनकी पूजा-अर्चना की जाएगी। पूजा का विधान—ज्योतिषविद् के अनुसार संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान ध्यान के पश्चात् व्रतकर्ता को मानसिक रूप से या अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुनः स्नान करके श्रीगणेश जी की पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार से पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्रीगणेशजी को मोदक एवं दूर्वा अति प्रिय है, इसलिए दूर्वा की माला, ऋतुफल, मेवे एवं मोदक अवश्य अर्पित करने चाहिए।