अर्थात् नीलमणि श्रीश्याम (योगेश्वर श्रीकृष्ण के पूर्णावतार) परम्ब्रह्म परमेश्वर हैं, नीले घोड़े के असवार खाटूधीश श्रीश्याम परम तपस्या (तपोमूर्ति) हैं। परम् तत्व (तत्वमऽसि) नीलकमलों की अंगकांतिवाले श्रीश्याम ही हैं, इतना ही नहीं तारक ब्रह्म (आवागमन से मुक्त करा परम्पद् प्राप्त कराने वाले) श्री श्याम ही हैं। कमलनयन अखंडकोटि ब्रह्माण्ड नायक परम ब्रह्म योगेश्वर श्रीकृष्ण के पूर्णावतार युगपुरुषोत्तम भगवान श्रीश्याम सुंदर के आविर्भाव (प्राकट्य) की मांगलिक बेला में चतुर्दिक अलौकिक आनंद का प्रसरण हो रहा था। समस्त देवगण इसी पुण्य तिथि में शयनोपरांत समग्र सृष्टि का मंगल करने के लिए उद्बोधित हुए, इसीलिए ‘देव उद्बोधनी एकादशी’ के नाम से यह तिथि विख्यात है।

सवोत्तम पुण्यातिपुण्य कार्तिक मास की शुक्लपक्ष एकादशी रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण के पूर्णावतार भगवान श्रीश्याम दिव्य वपु धारण करके ठीक उसी प्रकार माता अहिलवति के गर्भ से प्रगट हो गए, जिस प्रकार प्राची दिशा में पूर्ण चन्द्रमा उदय होते हैं। इस विलक्षण तजोराशि बालक रूपिणौ श्री श्याम सुंदर के अनुपम तेज से सर्वत्र प्रकाश का प्रसरण होने लगा। सिद्ध, गंधर्व, विधाधर, चारण आदि समवेत मांगलिक गान करने लगे। देवांगनाएं, अप्सराएं, किन्नर नृत्य करने लगे तथा नील गगन से देवगण पुष्प वृष्टि करने लगे। नदियां विमल निर्मल जल से और सरोवर रंग-बिरंगे चित्ताकर्षक कमल पुष्पों से सुशोभित हो उठे। कल-कल निनाद करती हुई  झरणों की निर्झर ध्वनि सप्तस्वर में हृदय-तंत्री को झंकृत करने लगी। शीतल मंद सुवासित वायु मंथर गति से बहने लगी। द्वापर युग में श्रेष्ठ पांडव कुल में अवतरित होकर इस कलिकाल में स्मरण मात्र से सभी की मनोकामनाओं को पूर्ण करने का वरदान अपने पूर्णावतार अनंतदातार भगवान श्रीश्याम को स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान ने देते हुए कहा था- ‘श्रेष्ठ वीर! कलियुग में मेरे ही ‘श्याम’ नाम से महान पूजनीय होगे।’ श्री श्याम सुंदर जब प्रकट हुए उस समय इनके चार भुजाएं थी।

चतुर्भुज नारायण श्रीश्याम के कर-कमलों में क्रमशः शंख, सुदर्शन चक्र, गदा एवं  पद्म (कमल पुष्प) शोभायमान थे। चमचमाती स्वर्णिम पीताम्बरी को धारण किए हुए थे। किरीट, मुकुट, चन्दि्रका, मकराकृति कुंडल आदि दिव्य आभूषण निरतिशय श्रीश्याम के सौंदर्य का वर्द्धन कर रहे थे। ‘वा वक्रा अलकाः केशा यस्य’ जिनके बड़े सुंदर घुंघराले केश हैं- इसलिए बाल श्याम सुंदर (केशव) का प्रारंभिक नाम बर्बरीक पड़ा। अतुलनीय तेज शौर्य तथा बलशाली, सर्वशास्त्र मर्मज्ञ, परम धार्मिक तत्वेत्ता एवं अद्वितीय पौरुष संपन्न ‘बर्बरीकजी’ ही अखंडकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान श्रीकृष्ण के पूर्णावतार युगपुरुषोत्तम भगवान श्री श्याम सुंदर हैं। बहुत से भक्त इन्हें श्रद्धा व प्रेम से श्री खाटूश्याम कहते हैं। वेदव्यासजी ने अपनी वृहद् कृति महाभारत में तदुपरि अपने श्रेष्ठतम् ‘श्रीग्रंथ- श्रीमद्भागवत महापुराण’ में पांडवकुल भूषण भगवान श्रीश्याम सुंदर की अनुपम कथा सविस्तार लिखी है। भगवान श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम हैं तो भगवान श्रीकृष्ण लीला पुरुषोत्तम।  श्री कृष्णावतारी भगवान श्री श्याम सुंदर युग पुरुषोत्तम हैं।

आविर्भाव (प्राकट्य) होते ही श्रीश्याम सुंदर बड़े होने लगे। युगपुरुषोत्तम श्रीश्याम श्रीकृष्ण की तरह ही अनुपम सौन्दर्यराशि रूप माधुर्य से परिपूर्ण पीतांबरधारी साक्षात् नारायण ही हुए। प्राकट्य होते ही इनके पिता महाबली भीम के पुत्र वीरवर घटोतकच्छ ने द्वारिका में ले जाकर इन्हें परात्पर परम्ब्रह्म श्रीकृष्ण के पावन श्रीचरणों में समर्पित कर दिया। भगवान, श्रीकृष्ण की ही आज्ञा से बालक श्रीश्याम सुंदर ने पराम्बा भगवती आद्याशक्ति मूलप्रकृति सुरेश्वरी की आराधना करने लगे। इन्होंने देवर्षि नारद द्वारा स्थापित नव दुर्गाओं की महिसागर संगम तीर्थ में जाकर आराधना करनी शुरू कर दी। 

भागवत पुराण के अनुसार खाटू खटांग नामक नगरी में यहां के राजा को श्रीश्याम सुंदर ने स्वप्न में मंदिर बनवाने का निर्देश दिया। महोत्सवपूर्वक खाटू नगर के बीच में राजा ने भव्य मंदिर बनवाकर श्रीश्याम प्रभु के पावन शीश की स्थापना वेदोक्त विधि से विद्वान द्विजश्रेष्ठों को बुलाकर करवाई। मंदिर के पीछे एक विशाल श्याम वाटिका है जिसके नित्य शृंगार के लिए तरह-तरह के सुंदर सुवासित पुष्पों का चयन करके शृंगार किया जाता है। श्रीश्याम प्रभु की खाटूधाम में प्रतिदिन पांच बार आरती होती है। फाल्गुन शुक्ल एकादशी को श्रीश्याम प्रभु ने अपने ही पूर्णस्वरूप भगवान श्रीकृृष्ण को शीश का दान दिया था इसलिए खाटू में विशाल मेला लगता है तथा द्वादशी को ज्योत लेकर भक्तगण अपने इष्टदेव श्रीश्याम का पावन दर्शन कर मनोवांछित इच्छा प्राप्त करके कृृतकृृत्य होते हैं। कार्तिक शुक्ला एकादशी को श्री श्याम प्रभु का जन्मोत्सव भी बहुत ही धूमधाम से अपार श्याम भक्तों की भीड़ में खाटू में देखते ही बनता है। बारह महीने सदैव श्याम भग्तों की भीड़ निरंतर दर्शनार्थ रहती है।