चुनाव आयोग ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद शिवसेना का नाम तथा चुनाव चिन्ह धनुष-बाण एकनाथ शिंदे की नेतृत्व वाली शिवसेना को दे दी है। चुनाव आयोग के इस फैसले से उद्धव ठाकरे की नेतृत्व वाली शिवसेना को करारा झटका लगा है। बाला साहब ठाकरे ने जिस शिवसेना को गठित किया था उसकी बागडोर फिलहाल उनके खानदान के हाथ से निकल गई है। अब तो शिंदे की नेतृत्व वाली शिवसेना ने महाराष्ट्र विधान भवन स्थित शिवसेना विधायक दल के कार्यालय को भी अधिकृृत करने की मांग की है। शिंदे गुट के मुख्य सचेतक भरत गोगावाले ने विधानसभा अध्यक्ष से इस विषय में अनुरोध किया है।
पिछले वर्ष शिवसेना का एक गुट चाहता था कि कांग्रेस तथा एनसीपी का दामन छोड़कर भाजपा के साथ काम करें। लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ऐसा करने को तैयार नहीं थे। इसका नतीजा यह हुआ कि शिवसेना से 35 से ज्यादा विधायकों ने विद्रोह करते हुए महाविकास अघाड़ी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। 21 जून 2022 को शिवसेना के बागी गुट के नेता एकनाथ शिंदे ने भाजपा के सहयोग से महाराष्ट्र के 20वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। उसके बाद से ही शिवसेना के नाम तथा चुनाव चिन्ह के लिए दोनों गुटों के बीच संघर्ष चल रहा था। अब पार्टी के नाम तथा चुनाव चिन्ह की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई है। ठाकरे गुट की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि पार्टी का नाम तथा चुनाव चिन्ह उनको मिलना चाहिए।
शिंदे गुट की तरफ से भी पहले ही सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि कोई फैसला सुनाने से पहले हमारे पक्ष को भी सुना जाए। सुप्रीम कोर्ट संभवत: कल इस केस को दर्ज करेगा। अब सबका ध्यान सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरफ है। अब उद्धव ठाकरे के पास अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए शिंदे गुट के साथ समझौता करने का ही विकल्प है। फिलहाल इस तरह की कोई स्थिति बनती नजर नहीं आ रही है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ठाकरे को अपनी छवि बचाने के लिए जनता के बीच जाना चाहिए। ऐसे में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का रास्ता ठाकरे अनुसरण कर सकते हैं। जयललिता ने मतदाताओं के समर्थन के बल पर एआईडीएमके पार्टी पर कब्जा किया था।
हालांकि एआईडीएमके के संस्थापक एमजी रामचन्द्रन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी जानकी रामचन्द्रन के नेतृत्व वाले एआईडीएमके के अधिकांश बड़े नेता उसमें शामिल हो गए थे। उद्धव ठाकरे मुंबई नगर निगम या दूसरे नगर निकायों के चुनाव से अपनी शुरूआत कर सकते हैं। लेकिन ठाकरे गुट को ङ्क्षशदे गुट तथा भाजपा की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। आगे का रास्ता उद्धव गुट के लिए आसान नहीं है। अब उन्हें आत्ममंथन कर पार्टी में नई जान फूंकने के लिए जोर लगाना होगा।