त्रिपुरा में मतदान की तिथि नजदीक आने के साथ ही राजनीतिक माहौल गर्म होते जा रहा है। राजनीतिक पार्टियों के नेताओं द्वारा तीखे हमले किये जा रहे हैं। मालूम हो कि त्रिपुरा में 16 फरवरी तथा नगालैंड एवं मेघालय में 27 फरवरी को मतदान होना है। इन तीनों राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकारें थी। 60 सदस्यीय त्रिपुरा विधानसभा में पिछले चुनाव में भाजपा को 36 सीटों पर विजय मिली थी। भाजपा ने करीब ढाई दशक तक सत्ता पर कुंडली मारकर बैठे वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंका था। मेघालय एवं नगालैंड में भाजपा छोटे भाई की भूमिका में थी।

ऐसी स्थिति में त्रिपुरा का चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। भाजपा ने सरकार विरोधी भावना को कम करने के लिए विप्लब देब को मुख्यमंत्री पद से हटाकर माणिक साहा को कमान सौंपी थी। इस बार के चुनाव में भाजपा को कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा को हराने के लिए दो धुरविरोधी पार्टियां कांग्रेस तथा माकपा ने हाथ मिला लिया है। माकपा 47 तथा कांग्रेस 13 सीटों पर प्रतिद्वंद्विता कर रही है।

पिछले चुनाव में दोनों पार्टियों को कुल मिलाकर 50 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। देखना है कि गठबंधन होने के बाद दोनों पार्टियों के समर्थक इस दोस्ती को पचा पाते हैं या नहीं। त्रिपुरा चुनाव में इस बार तृणमूल कांग्रेस पूरे दमखम के साथ सभी 60 सीटों पर मैदान में उतर चुकी है। टीएमसी द्वारा सभी सीटों पर प्रतिद्वंद्विता करने से माकपा-कांग्रेस गठबंधन को निश्चित रूप से झटका लगेगा। टीएमसी ज्यादातर इसी गठबंधन का वोट काटेगी। टीएमसी के चुनाव में उतरने के कारण त्रिपुरा में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।

भाजपा अपने पुराने सहयोगी आईपीएफटी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। भाजपा 55 सीटों पर तथा आईपीएफटी 5 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। आदिवासी वोटों पर सभी पार्टियों की नजर है। भाजपा ने जहां आईपीएफटी को साथ लिया है, वहीं माकपा ने आदिवासी नेता जितेंद्र चौधरी को अपना चेहरा बनाया है। टिपरा मोथा नामक क्षेत्रीय पार्टी भी चुनाव मैदान में है। त्रिपुरा में फतह हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार त्रिपुरा में रैलियों को संबोधित  कर रहे हैं। प्रधानमंत्री लगातार माकपा तथा कांग्रेस पर हमलावर हैं। यह सही है कि केरल में माकपा और कांग्रेस के बीच कुश्ती चल रही है, जबकि राजनीतिक स्वार्थ के लिए यही दोनों पार्टियां त्रिपुरा में गलबहियां कर रही हैं। राजनीति पार्टियों से जो न करवा दे।

गृह मंत्री अमित शाह भी लगातार त्रिपुरा पर फोकस कर रहे हैं। नेडा के संयोजक एवं असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा के लिए भी त्रिपुरा का चुनाव किसी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं है। डॉ. शर्मा भी लगातार त्रिपुरा में चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। त्रिपुरा में चुनावी रणनीति बनाने में भी उनकी बड़ी भूमिका है। वर्ष 2023 में पूर्वोत्तर के चार राज्यों सहित कुल नौ राज्यों में विधानसभा का चुनाव होना है। इन तीन राज्यों के बाद इस साल के अंत तक मिजोरम में भी विधानसभा का चुनाव होगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार पूर्वोत्तर क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है। यही कारण है कि 2014 के बाद भाजपा पूर्वोत्तर में सबसे बड़ी सियासी ताकत के रूप में उभरी है। अपने सियासी वर्चस्व को बचाये रखने की बड़ी चुनौती है। कांग्रेस और माकपा भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए पूरा जोर लगा रही है। टीएमसी के आने से भाजपा को लाभ होगा। त्रिपुरा में भाजपा ने शून्य सीट से बहुमत हासिल करने का जो कीर्तिमान बनाया है, उसको बचाने के लिए भाजपा ने त्रिपुरा में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कुल मिलाकर त्रिपुरा का चुनाव देश की राजनीति में अहम् भूमिका निभाएगा।