दक्षिण-पूर्व तुर्की तथा दक्षिण सीरिया में हुए भीषण भूकंप से चारों तरफ तबाही का मंजर देखने को मिल रहा है। हर तरफ लाशों का ढेर दिखाई दे रहा है। रिक्टर स्केल पर 7.8 की तीव्रता वाले भूकंप के झटके ने लाखों घरों को जमींदोज कर दिया है। चारों तरफ कोहराम मचा हुआ है, जहां लोग जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। तुर्की के कहरामनमारस प्रांत के गाजियांतेप शहर से 30 किलोमीटर दूर 24 किलोमीटर नीचे भूकंप का केंद्र था। पहला झटका सुबह 4.17 बजे आया जिसकी तीव्रता 7.8 थी। उसके 11 मिनट बाद दूसरा झटका तथा 19 मिनट बाद तीसरा झटका महसूस हुआ जिसकी तीव्रता क्रमशः 6.7 एवं 5.6 थी। आज भी दो बड़े झटके महसूस किये गए हैं।

हालांकि तुर्की व सीरिया के सीमावर्ती क्षेत्रों में भूकंप के कई छोटे-छोटे झटके महसूस किये गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या 5000 से ज्यादा बताई जाती है, किंतु गैर-सरकारी संस्थाओं का अनुमान है कि यह संख्या 5 गुना से ज्यादा हो सकती है। लेबनान और इजरायल देश भी इस भूकंप से प्रभावित हुआ है, किंतु अभी तक वहां से जान-माल के नुकसान की कोई बड़ी खबर नहीं है। तुर्की में इस घटना को लेकर सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की जा चुकी है। स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। तुर्की ने विश्व समुदाय से सहायता करने की अपील की है। मन-मुटाव के बावजूद भारत ने मानवता धर्म का पालन करते हुए सर्वप्रथम मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। प्रधानमंत्रा नरेन्द्र मोदी ने तुर्की में हुए प्राकृृतिक त्रासदी पर दुख व्यक्त करते हुए कहा है कि इस संकट की घड़ी में भारत तुर्की के साथ खड़ा रहेगा। विदेश राज्यमंत्री मुरलीधरन ने नई दिल्ली स्थित तुर्की के दूतावास जाकर शोक व्यक्त किया। तुर्की के राजदूत ने सहायता के लिए भारत का धन्यवाद करते हुए कहा कि जरूरत के वक्त काम आने वाला दोस्त ही असली दोस्त होता है। भारत ने राहत और बचाव कार्य के लिए एनडीआरएफ की दो मेडिकल टीमें तथा डॉग स्क्वॉड को तत्काल तुर्की भेजा है। भारतीय वायु सेना के विमान से चिकित्सा एवं राहत सामग्री की दो खेप भेजी गई है। भारत की पहल के बाद नाटो, यूरोपीय संघ के देशों तथा चीन ने भी मदद देने की घोषणा की है।

आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड 11 मिलियन डॉलर (90 करोड़ रुपए) की सहायता भेज रहा है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां भी राहत एवं बचाव कार्य में लग चुकी हैं। मालूम हो कि कश्मीर मुद्दे पर तुर्की हमेशा पाकिस्तान का साथ देता रहा है। हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर तुर्की भारत के हितों के खिलाफ काम करता है। इसके बावजूद भारत ने मानव धर्म का पालन करते हुए तुर्की की जो त्वरित सहायता की है उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। भविष्य में तुर्की अब भारत के खिलाफ जाने के मुद्दे पर सौ बार सोचेगा। तुर्की और सीरिया के भूकंप को देखकर 26 जनवरी 2001 में गुजरात के कच्छ एवं भुज में आए भयंकर भूकंप की याद ताजा हो गई है। 7.7 तीव्रता वाले उस भूकंप में 30 हजार लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी थीं तथा 4 लाख से ज्यादा मकान ढह गए थे। भारत का 59  प्रतिशत हिस्सा जिसमें 8 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश शामिल हैं, भूकंप के संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं। हिमालय के क्षेत्र सबसे संवेदनशील क्षेत्र हैं, जहां भूकंप की सबसे ज्यादा आशंका बनी रहती है।

जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड एवं पूर्वोत्तर के राज्य सबसे खतरनाक जोन-5 में आते हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में 1905 में भयंकर भूकंप आया था। 1934 में बिहार-नेपाल के क्षेत्र में 8.2 तीव्रता वाले भूकंप से 10 हजार लोगों की जानें गई थीं। 1991 में उत्तरकाशी में 6.8 तीव्रता वाले भूकंप में 800 लोग मरे थे। वर्ष 2005 में जम्मू-कश्मीर में हुए 7.6 तीव्रता वाले भूकंप ने 80 हजार लोगों की जिंदगियां छीन ली थीं। भारत को भी भूकंप जैसे प्राकृृतिक त्रासदी से निपटने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। विकास के नाम पर प्रकृृति से छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए। विकास और प्रकृृति के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। तुर्की की घटना से दुनिया को सीख लेने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दे पर दुनिया के देशों को गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।