सबार हमने अपने देश का 74वां गणतंत्र दिवस मनाया। इस मौके पर हम सब ने इस बात का मूल्यांकन किया कि हमारा गणतंत्र या लोकतंत्र पिछले 74 वर्षों में कितना मजबूत हुआ, इसमें कोई शक नहीं कि हमने आर्थिक और सामरिक दृष्टि से मजबूती हासिल की है। वैश्विक मंदी और यूक्रेन युद्ध के बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ खड़ी है, यह हमारे लिए राहत की बात है, परंतु इन दिनों हरेक व्यक्ति एक-दूसरे से सवाल पूछ रहा है कि क्या हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पहले जैसी मजबूत है? खासतौर पर जब हम देश के कानून मंत्री को अदालतों के खिलाफ बयानबाजी करते हुए देखते हैं तो उपरोक्त आशय का सवाल और गहरा हो जाता है। साथ ही जब इस संदर्भ में देश के उपराष्ट्रपति अदालत को उसकी हदें बताने लगते हैं तो आशंका और प्रबल हो जाती है। आमतौर पर माना जाता है कि सरकार और न्यायपालिका लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ हैं और फिलहाल हमारे देश में दोनों में मनमुटाव जारी है और यह मनमुटाव सार्वजनिक हो चुका है। खासतौर पर न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े कॉलेजियम सिस्टम में सुधार को लेकर अदालत और सरकार के बीच बढ़ता टकराव थमता नहीं दिख रहा है। कानून मंत्री किरेन रिजीजू के ताजा बयान ने इस विवाद को और हवा दे दी है। उनके मुताबिक जजों को एक बार जज बनने के बाद किसी आम चुनाव या सार्वजनिक तौर पर किसी जांच का सामना नहीं करना पड़ता है। ऐसे में ये तो साफ है कि न्यायाधीशों को आम लोग नहीं चुनते हैं और यही वजह है कि जनता आपको (जज) बदल भी नहीं सकती, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि जनता आपको देख नहीं रही है। उनके इस बयान को न्यायपालिका पर सीधे हमले के तौर पर देखा जा रहा है। इसलिए बड़ा सवाल ये है कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच पैदा हुआ तनाव कैसे कम होगा और इसमें कौन-सा पक्ष झुकने को राजी होगा? वास्तव, में, सरकार कहती है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों को नियुक्त करने की जो प्रक्रिया बरसों से चली आ रही है, उसमें सुधार करने की जरूरत है। इस कॉलेजियम सिस्टम में सरकार का भी एक नुमाइंदा होना चाहिए, लेकिन न्यायपालिका सरकार के इस विचार से सहमत नहीं है और वे इसे न्यायिक व्यवस्था में कार्यपालिका की सीधी दखलंदाजी मानती है। सरकार और न्यायपालिका के बीच मतभेद की शुरुआत बीते साल नवंबर महीने में हुई थी, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने पांच सीनियर एडवोकेट को हाइकोर्ट के जज नियुक्त करने संबंधी नाम सरकार को भेजे थे, लेकिन सरकार की तरफ से कुछ नामों पर ऐतराज जताते हुए इस पर पुनर्विचार करने को कहा गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपने अधिकार-क्षेत्र में गैर जरूरी दखलंदाजी माना और वह अब भी उन्हीं नामों को मंजूरी देने पर अड़ा हुआ है। इस बीच रिजीजू ने सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई को एक पत्र लिखा, जिसे लेकर वे विपक्ष के निशाने पर आ गए थे। विपक्षियों के मुताबिक उनके पत्र में कथित तौर पर कॉलेजियम में सरकार का प्रतिनिधि रखने की मांग की गई थी। हालांकि रिजीजू ने सोमवार को इसका खंडन करते हुए कहा कि इस बात का कोई सिर पैर नहीं है। मैं भला कहां से उस प्रणाली में एक और व्यक्ति डाल दूंगा? लिहाजा, ये सवाल उठना लाजिमी है कि वे कॉलेजियम में अगर सरकार का नुमाइंदा रखवाना नहीं चाहते, तो फिर उसमें आखिर किस तरह का सुधार करवाना चाहते हैं और उन्हें मौजूदा सिस्टम से क्या दिक्कत है? लेकिन रिजीजू ने एक साथ दो विरोधाभासी बातें कही। एक तरफ तो उन्होंने न्यायपालिका को स्वतंत्र रखने की वकालत करते हुए कहा कि भारत में लोकतंत्र सिर्फ जीवित ही नहीं बल्कि मजबूती से आगे चले, उसके लिए एक मजबूत और आजाद न्यायपालिका का होना जरूरी है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि न्यायपालिका की आजादी को कमजोर या उसके अधिकार, सम्मान और गरिमा को कम करना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है,देश के कानून मंत्री को अपनी बातों पर एक बार जरूर सोचना चाहिए। कारण कि सरकार और अदालत के बीच जारी नूरा कुश्ती से हमारा लोकतंत्र प्रभावित हो रहा है, जिसे अब तक विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने की गरिमा प्राप्त है।
सरकार और शीर्ष अदालत
