जयपुर : नोबेल साहित्य पुरस्कार विजेता अब्दुलरजाक गुरनाह का कहना है कि लेखन केवल कुलीनता और महानता के बारे में नहीं है बल्कि जो कुछ महत्वपूर्ण है, उसे जिंदा बचाए रखने के लिए ‘साधारण सांसारिक काम’ है। रजाक ने यहां जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के रंगारंग उद्घाटन समारोह के दौरान यह बात कही। गुलाबी नगरी जयपुर की आबोहवा में घुली खिली खिली धूप में नगाड़ों की धमक के साथ 16वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) का धूमधाम से आगाज हुआ ।
मशूहर नगाड़ावादक नाथूलाल सोलंकी और उनके साजिंदों द्वारा राजस्थानी लोक वाद्य यंत्रों पर सुरों की रसीली तान छेड़ते ही क्लार्क आमेर का माहौल झूम उठा । इसी के साथ जेएलएफ की सह संस्थापक नमिता गोखले और विलियम डेलरिम्पल तथा टीमवर्क्स आर्ट्स के संजॉय के रॉय ने उद्घाटन किया। कोविड प्रतिबंधों के चलते तीन साल बाद जेएलएफ का आयोजन इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रूप से हो रहा है। ‘प्रतिरोध के रूप में लेखन’ पर अपने मुख्य संबोधन में तंजानियाई ब्रिटिश लेखक गुरनाह ने कहा कि प्रतिरोध किसका? शायद यह प्रतिरोध विस्मृति के प्रति है, यह उसके प्रति प्रतिरोध है कि हम जो जानते हैं और जो हम याद रखते हैं, वह अनकहा न गुजर जाए।’
अपने संक्षिप्त संबोधन में गुरनाह ने कहा कि लेखन केवल कुलीनता और महानता के बारे में नहीं है बल्कि जो कुछ महत्वपूर्ण है, उसे जिंदा बचाए रखने के लिए ‘साधारण सांसारिक काम’ है। 74 वर्षीय लेखक ने कहा कि बहुत महत्वपूर्ण ये है कि इसमें एक प्रकार की जिम्मेदारी है, व्याकुलता के प्रति एक प्रतिरोध है, ये हमारे दिमाग को उन चीजों से दूर ले जाने के लिए है जिस पर हमारे दिमाग को ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और उन चीजों से ध्यान हटाने के लिए जो हमें भ्रमित करती हैं, हो सकता है कि पहली नजर में देखने पर वह आकर्षक लगे या तात्कालिक संदर्भ में नजर आए।’
‘मैमोरी आफ डिपार्चर’ के लेखक गुरनाह ने इसी क्रम में अपनी बात को जारी रखते हुए कहा कि लेखन उपेक्षा का भी प्रतिरोध है और लेखन यह सुनिश्चित करना है कि जो चीजें अहम हैं वे उपेक्षित न रह जाएं या ‘अन्य विमर्शों द्वारा विकृत न हो जाएं।’ उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि प्रतिरोध ‘जालिम से लड़ने के बारे में ही हो या मंचों पर खड़े होकर लोगों को उत्साहित करने के लिए जबरदस्त भाषण देना ही प्रतिरोध हो।