प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की विदेश नीति में काफी बदलाव हुआ है। पहले भारत नरम विदेश नीति के मार्ग पर अग्रसर हो रहा था। खासकर मोदी के दूसरे कार्यकाल के बाद विदेश नीति में काफी परिवर्तन आया है। दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री ने भारतीय विदेश सेवा के सचिव पद से अवकाशप्राप्त अधिकारी एस. जयशंकर को विदेश मंत्री नियुक्त किया। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारतीय विदेश नीति के समक्ष अग्निपरीक्षा होने वाली थी। अमरीका एवं पश्चिमी देश चाहते थे कि भारत रूस के खिलाफ उनकी नीतियों का पूरी तरह समर्थन करे। दूसरी तरफ रूस के पिछले रिकार्ड को देखते हुए भारत पर यह नैतिक दायित्व था कि वह संकट की घड़ी में रूस का साथ दे। भारत ने अपने हितों को ध्यान में रखकर अपनी विदेश नीति पर अमल करना शुरू किया है। रूस पिछले 70 वर्षों से संकट के समय हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है। 1971 के युद्ध के समय जब पूरी दुनिया भारत के खिलाफ खड़ी थी, उस वक्त रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने भारत का पूरा साथ दिया। इजरायल भी हर संकट के समय भारत के साथ खड़ा रहा है। वर्तमान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने बयान से पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया है। हाल ही में जयशंकर ने क्वाड के संबंध में बयान देकर अमरीका को आईना दिखाया है। जयशंकर ने क्वाड के बारे में कहा कि भारत अपने हितों को ध्यान में रखकर ही क्वाड के देशों की नीतियों का समर्थन करेगा। उन्होंने कहा कि क्वाड के देश पीओके के मामले में भारत का समर्थन नहीं करते तो फिर भारत भी सभी मुद्दों पर आंख बंद कर समर्थन क्यों करेगा? यह सबको मालूम है कि पीओके भारत का अभिन्न अंग है। लेकिन अमरीका ने कभी भी खुलकर हमारा साथ नहीं दिया। इसी तरह अफगानिस्तान में अमरीका ने भारत के हितों को नजरअंदाज करते हुए बिना सलाह-मशविरा के अपनी फौज को वापस बुला लिया। चीन द्वारा पाकिस्तान समर्थित आतंकियों को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव पर वीटो लगाने के मुद्दे पर जब क्वाड के देश चीन की खुली आलोचना नहीं कर रहे तो हम क्यों यूक्रेन के मामले में क्वाड की हर नीति का समर्थन करें। इसी तरह रूस से कच्चे तेल के आयात के मुद्दे पर भी जयशंकर ने पश्चिमी मीडिया की धरती से ही यूरोप को घेरा था। उन्होंने कहा था कि भारत एक महीने में रूस से जितना तेल खरीदता है उतना यूरोप के देश एक दिन के भीतर ही खरीद लेते हैं। ऐसी स्थिति में यूरोप को भारत को पाठ पढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। हथियार के मुद्दे पर भी जयशंकर ने ऑस्ट्रेलिया की धरती से अमरीकी एवं पश्चिमी देशों को करारा जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत जब युद्ध के संकट में था उस समय केवल रूस, इजरायल एवं फ्रांस ने हथियार देकर भारत की मदद की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि रूस के साथ भारत का जो सामरिक संबंध है, वह आगे भी जारी रहेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमरीका की धरती से ही उन्होंने अमरीका को करारा जवाब देकर सबको अचंभित कर दिया था। अमरीकी विदेश मंत्री ने भारत पर दबाव बढ़ाने के लिए कहा था कि भारत में हो रही गतिविधियों पर अमरीका की नजर है। उस वक्त जयशंकर ने करारा दवाब देते हुए कहा था कि भारत की भी अमरीका में हो रहे नस्लीय गतिविधियों सहित दूसरे मामलों पर नजर है। आज का भारत अपने हितों के अनुसार अपनी विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा है। एक तरफ भारत हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए काम कर रहा है, तो दूसरी तरफ हथियारों तथा दूसरे उपकरणों की विदेशों पर पहले से रही निर्भरता को कम कर रहा है। आज भारत तेजी से हर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इसी का नतीजा है कि अमरीका और यूरोप सहित सभी देश भारत को अपने पाले में रखना चाहते हैं। भारत के सामने चीन की विस्तारवादी एवं कर्जजाल नीति बड़ी चुनौती पेश कर रही है। श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल एवं मालदीव जैसे देश चीन के कर्जजाल में फंस चुके हैं। ऐसी स्थिति में उनकी विदेश नीति काफी हद तक चीन समर्थक होने पर मजबूर हो रही है। भारत ऐसे देशों को अपने पाले में लाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि आज दुनिया में प्रधानमंत्री मोदी एवं विदेश मंत्री एस. जयशंकर की नीति की सराहना हो रही है।
आक्रामक विदेश नीति
