गुजरात के मोरबी में मच्छू नदी पर बने पुल के टूटकर गिरने से 135 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अभी भी बहुत लोग फंसे हुए हैं जिनको बचाने के लिए राहत एवं बचाव कार्य तेजी से चलाया जा रहा है। पुल टूटने के बाद से ही सेना, वायु सेना एवं नौसेना के जवान लगातार लोगों को बचाने में लगे हुए हैं। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवान भी मुश्तैदी के साथ लगे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो अभी गुजरात में हैं, लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। उन्होंने घटनास्थल पर जाकर स्थिति का जायजा लिया तथा वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकर स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटना लोगों के दिलों को झकझोरने वाली है। उन्होंने पीडि़त परिवारों से मिलकर उनका दुखदर्द बांटा। मोरबी हादसा कई तरह के सवालों को खड़े कर रहा है। प्रश्न यह उठता है कि अगर उस पुल की क्षमता अधिकतम सौ लोगों की थी तो प्राइवेट कंपनी ओरेवा द्वारा 675 लोगों का टिकट क्यों काटा गया? 17 रुपए में लोगों को मौत का टिकट क्यों दिया गया? पुलिस ने इस मामले में   कुल नौ लोगों को गिरफ्तार किया है, जिसमें दो ठेकेदार, कंपनी के दो मैनेजर, तीन सिक्योरिटी गार्ड तथा दो क्लर्क शामिल हैं। प्रश्न यह उठता है कि सौ की जगह 675 लोगों को टिकट कंपनी के प्रबंधन की अनुमति के बिना नहीं काटा गया होगा। इतने बड़े फैसले में कंपनी के मालिक जरूर शामिल होंगे। पुलिस प्रशासन द्वारा अभी तक कंपनी के डायरेक्टर, चेयरमैन या प्रबंध निदेशक को क्यों गिरफ्तार नहीं किया गया? क्या प्रशासन छोटे अधिकारियों को गिरफ्तार कर मामले को रफा-दफा करना चाहता है? दूसरी बात यह है कि मोरबी पुल की मरम्मत के बाद नगरपालिका द्वारा एनओसी दिए जाने के पहले ही पुल को कैसे चालू कर दिया गया? अगर कंपनी ने पुल को बिना अनुमति के ही चालू कर दिया तो प्रशासन हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहा? इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि पुल की मरम्मत करने वाले ठेकेदार तथा प्रशासन के बीच कोई साठ-गांठ तो नहीं हुआ है। इस मामले में जो भी दोषी पाया जाता है उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। सरकार विकास के कार्यों में निजी क्षेत्रों को बढ़ावा दे रही है। अगर निजी क्षेत्र की कंपनियां इसी तरह मुनाफा कमाने के लिए काम करती रही तो इस तरह की घटनाओं को रोकना मुश्किल होगा। देश में इस तरह की घटना कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2016 में पश्चिम बंगाल के मध्य कोलकाता स्थित विवेकानंद रोड में एक पुल के धंस जाने से 27 लोगों की मौत हो गई थी। चुनाव से पहले घटना होने के कारण यह चुनावी मुद्दा बन गया था। झारखंड में भी एक रोप-वे के फंसने से काफी हंगामा मचा था। गुजरात में भी किसी वक्त विधानसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है। ऐसी स्थिति में विपक्षी पार्टियां इसको चुनावी मुद्दा बनाने से पीछे नहीं हटेंगी। कांग्रेस ने तो इसके लिए रणनीति भी तैयार कर ली है। आम आदमी पार्टी ने भी मोरबी हादसे को लेकर भाजपा पर हमला शुरू कर दिया है। अगले विधानसभा चुनाव में विपक्षी पार्टियां मोरबी के मुद्दे पर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा करने की हरसंभव कोशिश करेगी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री घटना होने के साथ ही सक्रिय हो गए हैं। तीनों सेनाओं के जवानों को मोर्चे पर लगाना इस बात का सबूत है कि भाजपा लोगों की जिंदगी बचाने के मामले में कोई कोर-कसर छोडऩा नहीं चाहती है। अब तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्टने याचिका को स्वीकार करते हुए आगे की सुनवाई के लिए तारीख मुकर्रर कर दी है। बार-बार हो रही इस घटनाओं के बावजूद राज्य सरकारें तथा प्रशासन इससे सबक क्यों नहीं ले रहा है? जब तक भ्रष्टाचार एवं लापरवाही का बोलबाला रहेगा तब तक जिंदगी इसी तरह दांव पर लगती रहेगी।