अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने बीते शनिवार को बड़े बांध के खिलाफ मानव शृंखला बनाकर एकजुटता प्रदर्शित की। इस प्रदर्शन का उद्देश्य असम या पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में बड़े बांधों के कारण आने वाली परेशानियों से राज्यवासियों को बचाना है। दूसरी ओर इसके कुप्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखने भी लगे हैं। जब से सुबनसिरी नदी पर बांध बनाकर बिजली उत्पन्न करने की परियोजना निर्माण का काम शुरू हुआ है राज्य के धेमाजी और लखीमपुर में लोगों को बार-बार बाढ़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी बीच पिछले दिनों इस परियोजना के बिजली घर की सुरक्षा दीवार नदी में जल स्तर वृद्धि के कारण ढह गई। उक्त हादसा सुबनसिरी नदी के उफान पर होने के कारण हुआ। हालांकि,कंपनी ने अपने सभी कर्मचारियों को बिजलीघर से बाहर निकाल लिया। कहा जा रहा कि अरुणाचल प्रदेश में भारी बारिश से सुबनसिरी बांध में पानी की मात्रा बढ़ने से बिजली घर की सुरक्षा दीवार का एक हिस्सा ढह गया। जानकारों का कहना है कि बिजलीघर के निर्माण कार्य के अंतिम चरण में होने वाले नुकसान को खतरा माना जा रहा है। दूसरी ओर देखा जा रहा है कि इस परियोजना के कारण इस परियोजना के आस-पास एक बड़े भू-भाग में पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो गई है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ धंसने लगे हैं। मालूम हो कि यह परियोजना कांग्रेस के समय शुरू हुई थी, उस समय से अब तक आसू सहित विभिन्न जातीय संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं। विशेषज्ञों की रिपोर्ट भी इस परियोजना के खिलाफ थी। बावजूद इसके इस परियोजना का निर्माण कार्य सदैव जारी रहा। कभी धेमाजी और लखीपुर में कांग्रेस की स्थिति बहुत ही मजबूत थी, परंतु इस बांध के कारण कांग्रेस को उस क्षेत्र के लोगों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा और दिसपुर और दिल्ली दोनों जगहों की सत्ता से कांग्रेस को हाथ धोना पड़ा। वर्ष 2014 के लोकसभा और 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से वादा किया गया कि यदि उसकी सरकार आई तो वह बड़े बांध की परियोजना को बंद कर देगी। इस तरह का वादा करने वालों में भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी शामिल हैं। वादे के बावजूद इस परियोजना का निर्माण कार्य जारी रहा और अब उसके परिणाम सामने हैं। जानकार बताते हैं कि एनएचपीसी ने गेरुकामुख में लोवर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना के निर्माण का लगभग 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। इसके बावजूद परियोजना स्थल पर एक अप्रत्याशित स्थिति बनी है। कहा जा रहा कि गेरुकामुख जैसे मुलायम पहाड़ों में बड़े बांध बनाकर एनएचपीसी  टिक नहीं पाएगी। आसू का आरोप है कि भाजपा सरकार ने सुबनसिरी बांध के निचले इलाके के लोगों की परवाह किए बिना गेरुकामुख में एक बड़ा बांध बनाकर जनता के साथ विश्वासघात कर रही है। केंद्र सरकार को इतने बड़े बांध को बनाने का कार्य बंद करना चाहिए। मालूम हो कि परियोजना के निर्माण से पहले विशेषज्ञ समिति ने जो आशंकाएं व्यक्त की थी,आज वह सत्य में परिवर्तित हो चुकी है। आसू  का कहना है कि यदि तत्कालीन केंद्र सरकार विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर अमल कर लेती तो आज स्थिति इतनी भयावह नहीं होती,परंतु दुर्भाग्य है कि वर्तमान सरकार भी सबक लेने को तैयार नहीं है, वह भी इस परियोजना के निर्माण कार्य को रोकना नहीं चाहती है। जानकारों का कहना है कि गेरुकामुख की पहाड़ियों में लगातार भूस्खलन के बाद अब आपदा शुरू हो गई है। एनएचपीसी,केंद्र और राज्य सरकारों ने बांध बनाने के लिए सीएए आंदोलन और कोविड-19 महामारी का फायदा उठाया है, लेकिन इन जल बमों को रोका जाना चाहिए। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बड़े बांध के माध्यम से पूर्वोत्तर को बड़े बिजली उत्पादन हब के रूप में बदला जा सकता है,परंतु इससे उत्पन्न मानव संकट को नजरअंदाज करना कतई ठीक नहीं है। बिजली की सुविधा आम आदमी को चाहिए, परंतु इसके एवज में जान-माल की हानि हो, यह कतई स्वीकार नहीं होगा।