भगवान् शिवजी की पूजा-अर्चना अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार हर आस्थावान धर्मावलंबी मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए करते हैं।
व्रत उपवास रखकर विधि : विधानपूर्वक भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना करने की विशेष महिमा है। वैसे तो भगवान शिवजी की पूजा कभी भी की जा सकती है, लेकिन प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी तिथि के दिन पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। प्रत्येक मास के दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने की धार्मिक परंपरा है। इस बार 7 अक्तूबर को प्रदोष व्रत रखा जाएगा। कलियुग में प्रदोष व्रत को शीघ्र फलदायी माना गया है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि आश्विन मास के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्तूबर, शुक्रवार को प्रात: 7 बजकर 27 मिनट पर लगेगी, जो कि उसी दिन 7 अक्तूबर, शुक्रवार को अद्र्धरात्रि के पश्चात 5 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप प्रदोष व्रत 7 अक्तूबर, शुक्रवार को रखा जाएगा। प्रदोषकाल का समय सूर्यास्त से 48 मिनट या 72 मिनट का माना जाता है। संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुन: स्नान करके स्वच्छ व धारण करके प्रदोषकाल में भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना उत्तराभिमुख होकर करने का विधान है।
प्रदोष व्रत का विधान : विमल जैन ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान-ध्यान, पूजा-अर्चना के पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए। दिनभर निराहार रहकर सायंकाल पुन: स्नान करके स्वच्छ वस्ïत्र पहन कर प्रदोष काल में भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार श्रद्धा-भक्तिभाव के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
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