गुवाहाटी : परम पूज्या श्रमणी ज्ञानमूर्ति गणिनी आर्यिका गुरु मां 105 विंध्यश्री माताजी ने अंतिम सोपान उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की विवेचना करते हुए बताया कि मोक्ष महल का अंतिम सोपान उत्तम ब्रह्मचर्य है। ब्रह्म का अर्थ है आत्मा। आत्मा में रमण करना आत्म चर्या में ही जीना उत्तम ब्रह्मचर्य है। गुरु मां ने कहा कि काम से पैदा होना मजबूरी है लेकिन काम में जीना और मरना मजबूरी नहीं है। काम में पैदा होकर भगवान का नाम लेकर जीना ही मानव जीवन की सफलता है। प्रत्येक मानव को काम में नहीं भगवान में जीने में अपना जीवन व्यतीत करने का अभ्यास करना चाहिए। मनुष्य को कमल की तरह जीवन यापन करना चाहिए। कमल पैदा तो कीचड़ में होता है लेकिन वह कीचड़ से दूर ही रहता है इसलिए हमें भी अपने जीवन को ब्रह्मचर्य व्रत पालन में लगाना चाहिए। अंत में गुरु मां ने कहा मन पर नियंत्रण ही सच्ची ब्रह्मचर्य साधना है। ब्रह्मचर्य की साधना ही मुक्ति की युक्ति है स्वयं में रमना और स्वयं में खो जाना उत्तम ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का अर्थ मात्र मैथुन क्रिया का त्याग नहीं बल्कि पांचों इंद्रियों पर विजय पाना बहुत जरूरी है। अच्छी संगति करो, अधिक से अधिक स्वाध्याय करो, प्रभु भक्ति, गुणगान में समय लगाओ आपकी यही साधना ब्रह्मचर्य का रूप ले लेगी। ब्रह्मचर्य धर्म ही तत्व का बोध कराता है।