भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों के पर्व खास देवी-देवताओं से जुड़े हुए हैं। व्रत त्योहार व पर्व पूर्ण आस्था एवं भक्तिभाव के साथ मनाने की परंपरा है। भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर शयन करने वाले भगवान् श्रीविष्णु जी की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि 8 सितंबर, गुरुवार को रात्रि 9 बजकर 04 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 9 सितंबर, शुक्रवार को सायं 6 बजकर 08 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप 9 सितंबर, शुक्रवार को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जाएगा। अनंत चतुर्दशी के व्रत से व्यक्ति को अपने जीवन में भगवान् श्रीविष्णु जी के आशीर्वाद से सुख-समृद्धि का सुयोग बना रहता है, साथ ही व्यक्ति का जीवन धन-धान्य से परिपूर्ण रहता है। अनंत चतुर्दशी के व्रत को 14 वर्ष तक नियमपूर्वक करने पर जीवन के समस्त दोषों का शमन होता है तथा सुख-समृद्धि में अभिवृद्धि होती रहती है। विमल जैन के अनुसार प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान के पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा के उपरांत अनंत चतुर्दशी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। व्रत के दिन भगवान् श्रीविष्णुजी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन कच्चे सूत के धागे को 14 गांठ लगाकर उसे हल्दी से रंगने के पश्चात् विधि-विधानपूर्वक अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए। इस सूत्र को अनंत सूत्र भी कहा जाता है। इस सूत्र को पुरुष दाहिने हाथ में तथा महिलाएं बाएं हाथ की भुजा में धारण करती हैं। अनंत सूत्र को 14 दिन तक धारण करने के पश्चात् 15वें दिन गंगाजी, नदी अथवा स्वच्छ जल में प्रवाहित कर देना चाहिए। अपनी परंपरा व रीति-रिवाज के अनुसार अनंत सूत्र (धागे) को वर्षपर्यन्त अगले अनंत चतुर्दशी तक धारण करने का भी विधान है। व्रतकर्ता को व्रत वाले दिन, दिन में शयन नहीं करना चाहिए। व्यर्थ की वार्तालाप से बचना चाहिए। अपने जीवनचर्या में शुचिता बरतनी चाहिए। व्रत के दिन नमक ग्रहण करना वर्जित है। एक ही अन्न से निर्मित नमक रहित भोज्य सामग्री या फलाहार ग्रहण किया जाता है।
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