मंगल ग्रह पर मानवीय अभियान भेजने में एक बड़ी चुनौती वहां ऑक्सीजन का उत्पादन करना है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कुछ तकनीकों पर काम तो किया है जिनमें से एक प्रयोग तो मंगल पर भी चल रहा है। लेकिन शोधकर्ता इस मामले में रुके नहीं हैं। इस कड़ी में एक नई ईजाद के तहत अंतरारष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने मंगल ग्रह पर कार्बन डाइऑक्साइड से ऑक्सीजन बनाने का नया तरीका विकसित किया है। प्लाज्मा आधारित यह पद्धति मंगल ग्रह के लिए ही नहीं बल्कि भविष्य में सुदूर मानवीय अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है। यह तकनीक नासाके मंगल ग्रह पर चल रहे ऑक्सीजन इन सीटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन एक्सपेरिमेंट प्रयोग के लिए सहायक पद्धति के तौर परकाम करेगी और यह अंतरिक्ष में भेजे गए उपकरणों की तुलना में प्रति किलोग्राम ज्यादा अणु उत्पादन की दर से नतीजे दे सकती है। इस तरह के सिस्टम मंगल ग्रह पर लाइफ सपोर्ट सिस्टम के विकास में अहम भूमिका भी निभा सकते हैं। इतना ही नहीं इस पद्धति से ईंधन, इमारती पदार्थ और खाद आदि के संसाधन के लिए मूल रसायन आदि का भी उत्पादन कर सकती है। एआईपी पब्लिशिंग के एप्लाइड फिजिक्स जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस पद्धति को पेश किया है। इसमे मंगल के स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए उत्पादन किया जा सकता है। चूंकि मंगल का वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की बहुलता है, इसके टूटने से ऑक्सीजन पैदा हो सकती है और वहां का दबाव प्लाज्मा के इग्नीशियन के लिए सही है। मंगल की प्राकृतिक स्थितियां स्थान विशेष पर ही प्लाज्मा के जरिए संसाधन उपयोग के लिए सटीक हैं। मंगल जैसे ग्रहों पर ऑक्सीजन का उत्पादन कई तरह की चुनौतियों से भरपूर है। मंगल पर ऑक्सीजन पैदा करने में दो बड़ी बाधाओं का सामना करना होगा। सबसे पहले कार्बनडाइ ऑक्साइड को विखंडित कर ऑक्सीजन निकालना क्योंकि यह सामान्य परिस्थितियों में भी बहुत मुश्किल काम होता है। इसके बाद दूसरी समस्या पैदा की गई ऑक्सीजन को उत्पादों के मिश्रण से अलग करना होगा जिसमें पहले से ही कुछ कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड मिली हुई होंगी। वैज्ञानिक इन दोनों ही चुनौतियों से एक साथ निपटने के कारगर तरीके की तलाश कर रहे हैं। यहीं पर प्लाज्मा मददगार हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने मंगल पर ऑक्सीजन पैदा करने का तरीका खोजा