बचपन में ‘सातवां घड़ा’ कहानी हम सबने सुनी होगी। इसमें सातवां घड़ा तृष्णा का होता है, जो कभी भरता नहीं है, चाहे उसमें कितना भी सोना डाल दिया जाए। अब एक स्टडी में कहा गया है कि हमारा ब्रेन भी कुछ ऐसा ही है, जो भरता नहीं है। रिसर्चर्स के मुताबिक, हमारे दिमाग की प्रोग्रामिंग ही इस तरह की है कि हम हमेशा और ज्यादा पाने की चाह रखते हैं। एक वस्तु मिलते ही हम किसी दूसरी चीज में अपनी खुशी ढूंढऩे लगते हैं। इस वजह से हम अक्सर दुख का अनुभव करते हैं। प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने इस व्यवहार को समझने के लिए कंप्यूटर मॉडल्स की मदद ली। शोधकर्ताओं ने इस स्टडी में जिक्र किया कि पुराने धर्म ग्रंथों से लेकर आधुनिक साहित्य में हमेशा बनी रहने वाली खुशी ढूंढऩे जैसी कहानियां मिलती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दो मनोवैज्ञानिक घटनाएं बताती हैं कि हमारे दिमाग को हमेशा भौतिक वस्तुओं की चाह रहती है। दरअसल, जो वस्तुएं हमारे पास हैं और जिन वस्तुओं की हमें चाह है, हमारा दिमाग उसमें तुलना करता है। इंसान की खुशी बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करती है। दूसरा ये कि हमारी खुशी किसी चीज को लेकर हमारी अपेक्षाओं पर भी निर्भर करती है। समय के साथ ये अपेक्षाएं बदल भी सकती हैं। यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के विशेषज्ञों का कहना है कि खुशी का सीधा संबंध हमारी अपेक्षाओं से होता है। यदि हम अपेक्षाओं को कम रखें तो हमारे खुश रहने की संभावना बढ़ जाती है। मगर अपनी अपेक्षाओं को इतना भी कम ना कर दें कि ये आपके जीवनस्तर को ही बदल दे। अपनी अपेक्षाओं में संतुलन बनाना जरूरी है।