पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र में राजनीतिक अस्थिरता का दौर चल रहा था। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अपनी सरकार को बचाने के लिए भरसक प्रयास किया, किंतु अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके। अंत में यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उद्धव सरकार के सामने इस्तीफा देने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। शिव सेना के बागी विधायक चाहते थे कि जल्द से जल्द विधानसभा में शक्ति परीक्षण हो, लेकिन मुख्यमंत्री खेमा इसे टालने के पक्ष में था ताकि उसे बागी विधायकों को मनाने का अवसर मिल सके। मुख्यमंत्री ठाकरे की भावुक अपील भी काम नहीं आई। उद्धव ठाकरे के इस्तीफे का बाद भाजपा, शिव सेना के बागी विधायकों एवं निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनने का रास्ता प्रशस्त हो गया। इसके बाद मुख्यमंत्री को लेकर पिछली रात से लेकर 30 जून के दोपहर तक संशय बना रहा। राजनीतिक पंडितों का मानना था कि पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व में सरकार बनेगी, जिसमें बागी विधायकों के नेता एकनाथ शिंदे उप-मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन शाम-शाम होते-होते पूरा समीकरण ही बदल गया। एकनाथ शिंदे ने भाजपा के समर्थन से महाराष्ट्र की बागडोर संभाल ली है। 30 जून को शिंदे ने मुख्यमंत्री तथा देवेन्द्र फडणवीस ने उप-मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है।  उद्धव सरकार में अनबन की शुरूआत 10 जून को हुए राज्यसभा के वक्त से ही शुरू हो गई थी। जिस तरह शिव सेना के बागी विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार का समर्थन उसी वक्त से यह लगने लगा कि यह सरकार बहुत दिनों तक नहीं चलने वाली है। 2019 में साथ-साथ चुनाव लडऩे के बावजूद शिव सेना ने जिस तरह भाजपा को झटका दिया उससे भाजपा बदला लेने की तैयारी में थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता देवेन्द्र फडणवीस वर्तमान एपिसोड में मराठा क्षत्रप शरद पवार को पटखनी दी है, उससे ऐसा लगता है कि अब शरद पवार युग का अंत हो गया है। भाजपा 2019 से अब तक जिस तरह ठाकरे एवं पवार परिवार से झटका खाया था, उसका अब बदला ले लिया है। पिछली गलतियों से सबक लेते हुए भाजपा ने महाराष्ट्र में इस पूरे प्रकरण में फूंक-फूंक कर कदम उठाया। शिव सेना में हुई बगावत में उसका आंतरिक मामला बताकर भाजपा ने तभी पत्ता खोला जब ठाकरे ने कुर्सी छोडऩे की घोषणा की। महाराष्ट्र की घटना ने शिव सेना के सामने बड़ी चुनौती पेश कर दी है। अब उद्धव ठाकरे को अपनी पार्टी को बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ जनाधार खोने का डर। कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने के कारण शिव सेना की हिंदुत्व की छवि को काफी धक्का लगा है। शिव सेना के बागी विधायकों ने हिंदुत्व के मुद्दे को ही आधार बनाकर बगावत की है। वर्ष 2014 में शिव सेना बड़े भाई की भाई की भूमिका से खिसक कर छोटे भाई की भूमिका में आ गई। उसके बाद से ही भाजपा और शिव सेना में खींचतान जारी है। ऑपरेशन लोटस के तहत भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश एवं गोवा में जोड़-तोड़ कर सरकार का गठन कर लिया है। अब महाराष्ट्र में भाजपा समर्थित सरकार अस्तित्व में आ गई है। अब आगे यह देखना होगा कि मंत्री पद के बंटवारे के दौरान किस तरह का फार्मूला अपनाया जाएगा। सबकी नजर भाजपा के अगले कदम की ओर है।