कई वर्षों से चल रही जद्दोजहद के बाद बिहार में जातिगत सर्वे का मार्ग प्रशस्त हो गया है। बिहार सरकार ने 7 जून को इसके लिए अधिसूचना जारी कर दी है। अधिसूचना के अनुसार 28 फरवरी 2023 तक जातिगत सर्वे का काम पूरा करना है। इस काम पर 500 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) एवं जनता दल(यू) पहले से ही जातिगत सर्वे की मांग कर रही थी। राजद नीतीश सरकार पर इस काम के लिए लगातार दबाव डाल रही थी। लेकिन भाजपा के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा था। पिछले कुछ महीनों से जद(यू) तथा भाजपा के बीच खटास बढ़ी है। इसको देखते हुए नीतीश कुमार ने राजद के द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टी में शामिल होकर भाजपा को संदेश देने का प्रयास किया। राजद की तरफ से तेजस्वी यादव ने जद(यू) के इफ्तार पार्टी में शामिल होकर दोनों पार्टियों के बीच तल्खी को कम करने का प्रयास किया। जद(यू) और राजद के बीच पक रही खिचड़ी को देखते हुए भाजपा को भी सर्वदलीय बैठक में जातिगत सर्वे के लिए हामी भरनी पड़ी। केंद्र सरकार जातिगत सर्वे कराने से इनकार करती है। भाजपा का मानना है कि बीपी मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद कुछ राज्यों खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ तथा उनका दबदबा बढ़ा। बिहार में जद(यू) एवं राजद तथा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाजवादी पार्टी इसका जीता-जागता उदाहरण है। वर्ष 2014 के बाद भाजपा का भी पिछड़ी जाति एवं अन्य जातियों में प्रभाव बढ़ा है, लेकिन भाजपा के सामने समस्या यह है कि उसका उच्च वर्ग एवं उच्च जाति में अच्छा प्रभाव है। इसको देखते हुए भाजपा ऐसा कोई काम करना नहीं चाहती जिससे उसके वोट बैंक पर असर पड़े। लेकिन नीतीश सरकार के अड़ जाने के बाद भाजपा के पास समर्थन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। जातिगत सर्वे के दौरान जाति के साथ-साथ आर्थिक स्थिति की भी गणना होगी। उसके बाद जाति की संख्या के आधार पर आरक्षण देने की मांग भी उठेगी, जिसको संभालना सरकार के लिए चुनौती भी बन सकती है। देश को आजादी मिलने के बाद सर्वप्रथम 1951 में जनगणना हुई थी। उसके बाद वर्ष 2011 तक देश में अब तक सात बार जनगणना हो चुकी है। अभी तक की जनगणना में केवल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की ही जातिगत गणना होती है। जातिगत जनगणना की मांग के बावजूद केंद्र सरकारों ने अब तक इसको ठंडे बस्ते में डाल रखा था। सर्वप्रथम कर्नाटक में 2014 में जातिगत सर्वे कराया गया था। सामाजिक-आर्थिक सर्वे की पूरी रिपोर्ट 2017 में कर्नाटक सरकार को सौंप दी गई थी, जिसे आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। सरकार को अंदेशा है कि इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने से कई तरह की मांगें उठेंगी। भाजपा ने बिहार में गठबंधन सरकार को बचाने के लिए अपनी राष्ट्रीय नीति से हटकर बिहार में जातिगत सर्वे को समर्थन दिया है।
बिहार में जातिगत सर्वे
