नई दिल्ली : आम आदमी को अप्रैल में महंगाई के मोर्चे पर झटका लगा है। खाने-पीने के सामान से लेकर तेल के दाम बढऩे से महंगाई 8 साल के पीक पर पहुंच गई है। वृहस्पतिवार को जारी किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) आधारित रिटेल महंगाई दर अप्रैल में बढक़र 7.79प्रतिशत हो गई। मई 2014 में महंगाई 8.32 प्रतिशत थी।  यह लगातार चौथा महीना है, जब महंगाई दर आरबीआई की 6 प्रतिशत की ऊपरी लिमिट के पार रही है। फरवरी 2022 में रिटेल महंगाई दर 6.07 प्रतिशत, जनवरी में 6.01 प्रतिशत और मार्च में 6.95 प्रतिशत दर्ज की गई थी। एक साल पहले अप्रैल 2021 में रिटेल महंगाई दर 4.23 प्रतिशत थी। बीते दिनों रिजर्व बैंक ने इस वित्त वर्ष की अपनी पहली मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग के बाद महंगाई के अनुमान को बढ़ाते हुए पहली तिमाही में 6.3 प्रतिशत, दूसरी में 5 प्रतिशत, तीसरी में 5.4 प्रतिशत और चौथी में 5.1 प्रतिशत कर दिया था। इसके बाद इमरजेंसी मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग में महंगाई की चिंताओं के कारण ब्याज दरों को 0.40 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला लिया था। दुनियाभर की कई अर्थव्यवस्थाएं महंगाई को मापने के लिए डब्ल्यूपीआई (होलसेल प्राइस इंडेक्स) को अपना आधार मानती हैं। भारत  में ऐसा नहीं होता। हमारे देश में डब्ल्यूपीआई  के साथ ही सीपीआई को भी महंगाई चेक करने का स्केल माना जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक और क्रेडिट से जुड़ी नीतियां तय करने के लिए थोक मूल्यों को नहीं, बल्कि खुदरा महंगाई दर को मुख्य मानक (मेन स्टैंडर्ड) मानता है। अर्थव्यवस्था के स्वभाव में डब्ल्यूपीआई और सीपीआई एक-दूसरे पर असर डालते हैं। इस तरह डब्ल्यूपीआई बढ़ेगा, तो सीपीआई भी बढ़ेगा। कच्चे तेल, कमोडिटी की कीमतों, मैन्युफैक्चर्ड कॉस्ट के अलावा कई अन्य चीजें भी होती हैं, जिनकी रिटेल महंगाई की दर तय करने में अहम भूमिका होती है। करीब 299 सामान ऐसे हैं, जिनकी कीमतों के आधार पर रिटेल महंगाई का रेट तय होता है।