महिलाओं के लिए बराबरी के हक की मांग के बीच महिला सुरक्षा और स्वतंत्रता की बात खूब हो रही है। नि:संदेह नौकरी, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और मेधा के मामले में वे किसी से भी कम नहीं हैं। दुनिया में आधी आबादी को बराबरी का हक मिले, इससे किसी को परहेज नहीं है, परंतु इसी बीच कुछ ऐसी घटनाएं  घट रही हैं, जो हमारी पूरी व्यवस्था को शर्मसार कर रही हैं। हाल ही में यूपी में हुई दो घटनाओं ने राज्य में न सिर्फ  कानून-व्यवस्था को आईना दिखाया, बल्कि औरतों के लिए कानून के दरवाजे की दूरी का भी एहसास कराया। यह दूरी तय करने में कभी जान जाती है तो कभी बलात्कार होता है। बीते सालों में बलात्कार के कई मामले सामने आए जिनमें पुलिस ने लापरवाही दिखाई। बुंदेलखंड इलाके के ललितपुर जिले के थाने में नाबालिग लडक़ी से कथित बलात्कार मामले में मुख्य अभियुक्त थानेदार तिलकधारी को गिरफ्तार करके जेल भले ही भेज दिया गया हो लेकिन महिला सुरक्षा की तमाम कोशिशों और दावों पर ऐसी घटनाएं पानी फेर देती हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक साल 2021 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 31 हजार मामले दर्ज किए गए।  साल 2014 के बाद इतने ज्यादा मामले कभी देखने को नहीं मिले। इन 31000 मामलों में से करीब 50 फीसदी मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। दर्ज मामलों की संख्या तो इतनी है लेकिन महिलाओं के खिलाफ होने वाले ज्यादातर मामले तो दर्ज हुए बिना ही रह जाते हैं। बलात्कार जैसे गंभीर मामलों में पीडि़त महिलाओं को एफआईआर के लिए संघर्ष करना पड़ता है। ये स्थितियां तब हैं जब यूपी में हर थाने में महिला कर्मचारियों की तैनाती अनिवार्य कर दी गई है और महिलाओं के लिए अलग थाने तक बनाए गए हैं। यह हाल तब है जब जीरो एफआईआर के तहत किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर अपनी शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार कोई भी शिकायतकर्ता चाहे वह पुरुष हो या महिला, किसी भी पुलिस स्टेशन पर शिकायत दर्ज करा सकते हैं और पुलिस स्टेशन इसके लिए मना नहीं कर सकता। पुलिस को अपराध की सूचना देने में देरी ना हो इसलिए जरूरी है कि जल्द-से-जल्द शिकायत दर्ज कराई जाए। इन सबके बावजूद महिलाओं को या तो शिकायत के लिए भटकना पड़ता है या फिर कई बार पुलिस थानों में भी उनका शोषण और उत्पीडऩ होता है। ललितपुर जिले के पाली थाने में नाबालिग लडक़ी सामूहिक बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने आई थी। उसकी एफआईआर लिखने की बजाए थानेदार ने बयान देने के लिए अगले दिन बुलाया और इस दौरान उन्होंने कथित तौर पर लडक़ी के साथ रेप किया। थाने में बलात्कार की खबर से हडक़ंप मच गई। झांसी परिक्षेत्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक यानी एडीजी जोन भानु भास्कर ने पाली थाने के सभी 29 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर दिया जिनमें छह सब इंस्पेक्टर भी शामिल हैं। तिलकधारी सरोज समेत छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके सभी को गिरफ्तार कर लिया गया है, इनमें लडक़ी की महिला रिश्तेदार भी शामिल है। इस घटना के दो दिन बाद ही यानी बृहस्पतिवार को ललितपुर जिले के ही महरौनी थाने के पुलिसकर्मियों ने एक महिला पर चोरी का आरोप लगाकर बंधक बनाया और फिर उसे नंगा करके रात भर पीटा। यही नहीं, बाद में पुलिस वालों ने पीडि़त महिला पर एफआईआर दर्ज कर दी। इस काम में थाने के एक कर्मचारी की पत्नी और महिला सब इंस्पेक्टर भी शामिल रहीं। आपराधिक दंड संहिता में साल 2013 का संशोधन पुलिस की ओर से बलात्कार की शिकायत दर्ज करने में विफलता को अपराध करार देता है। बावजूद इसके बलात्कार का केस दर्ज कराने में महिलाओं को ना सिर्फ नाकों चने चबाने पड़ते हैं बल्कि कई बार पुलिस के शोषण का भी शिकार होना पड़ता है।