इन दिनों देश में बेरोजगारी और महंगाई सबसे बड़ी समस्या है,परंतु इनके समाधान के लिए जिस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए,वैसे नहीं उठाए जा रहे हैं। सरकार इन्हें वैश्विक समस्या कहकर अपना पल्ला झाड़ रही हैं,परंतु ऐसा करना समस्या का समाधान नहीं है। वर्तमान में बेरोजगारी चरम पर है तो महंगाई बेलगाम है। आज जरूरत इस बात की है कि इनके समाधान के लिए कारगर कदम उठाए जाएं। आंकड़े बताते हैं कि देश में रोजगार की तलाश करने वाले लोगों की संख्या में जबरदस्त गिरावट आई है। रोजगार के उम्र वाले लोगों में से आधे से ज्यादा ने अब किसी रोजगार की तलाश ही छोड़ दी है और घर बैठने का निश्चय किया है,बल्कि ऐसा करने वाले लोग लगातार बढ़ते जा रहे हैं। दूसरी ओर अर्थव्यवस्था में भाग लेने वाले कामगारों का हिस्सा 2016 के मुकाबले पंद्रह प्रतिशत और कम हो गया है। दूसरी ओर देश में रोजगार कर सकने वाली जनसंख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जबकि ऐसे लोग लगातार कम होते जा रहे हैं, जो किसी नौकरी में लगे हैं। दिसंबर, 2021 में भारत में रोजगार की उम्र के लोगों की संख्या करीब 108 करोड़ थी, जिसमें से करीब 40 करोड़ यानी 37.5 फीसदी नौकरियों में लगे हुए थे। इसकी तुलना दिसंबर, 2016 के आंकड़ों से करें तो तब भारत में रोजगार की उम्र वाले लोगों की संख्या करीब 96 करोड़ थी, जिसमें से 41 करोड़ से ज्यादा यानी करीब 43 फीसदी लोग नौकरियों में लगे हुए थे यानी पिछले पांच सालों में 12 करोड़ से ज्यादा नए लोग नौकरी कर सकने की उम्र सीमा में आ गए लेकिन इसी दौरान देशभर में नौकरी कर रहे कुल लोगों की संख्या 80 लाख कम हो गई। मतलब ये हुआ कि बेरोजगारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा रहीं। भारत का लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट इतना कम होने के पीछे बड़ी वजह महिलाओं का लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट बहुत कम होना है। सीएमआईई के डाटा के मुताबिक दिसंबर, 2021 में पुरुषों का लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट जब 67 फीसदी था,तब महिलाओं का लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 10 फीसदी से भी कम था। सीधे-सीधे कहें तो काम करने की उम्र वाली 10 महिलाओं में से सिर्फ एक ही काम कर रही थी या काम की तलाश में थी। वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों की मानें तो भारत में महिलाओं की लेबर फोर्स में हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी है,जबकि इस मामले में दुनिया का औसत करीब 47 फीसदी है। ऐसी कई वजहें हैं, जिनके चलते महिलाओं में नौकरी की चाह कम हो जाती है। कानून-व्यवस्था, सार्वजनिक यातायात, महिलाओं के प्रति हिंसा, सामाजिक रूढ़ियां महिलाओं के काम न ढूंढ़ने के मामले में अहम रोल निभाते हैं। साथ ही अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान की अनदेखी भी इसकी वजह है। अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारत में अब भी महिलाओं के श्रम की सटीक माप नहीं की जा सकी है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय महिलाएं अपनी इच्छा से घरेलू रोजगारों में बिना किसी मेहनताने के लगी हुई हैं। एक मसला ये भी है कि महिलाओं के लायक रोजगार और उसके लिए परिस्थितियों का बेहद अभाव है। जानकार ये भी बताते हैं कि साल 2016 के बाद से लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन में आई कमी से ज्यादातर ऐसे घर प्रभावित हुए हैं, जहां एक से ज्यादा लोग नौकरी करते थे। ऐसे घरों में नौकरी में लगे किसी न किसी शख्स की नौकरी जरूर गई है। दूसरी ओर  बेलगाम महंगाई ने देश के अधिकांश लोगों की रसोई को प्रभावित किया है। खरीदारी घटने से लघु और मझौले व्यापारियों की स्थिति बदतर हुई है। रही सही कमी ऑनलाइन व्यवसाय और मॉल संस्कृति ने कर दिया है।