जंगल को बचाने और बढ़ाने को लेकर झारखंड के एक गांव ने अनोखी पहल शुरू की है। श्रमदान की मदद से गांव के लोग जंगल में गड्ढा का निर्माण कर रहे हैं। आप सोच रहे होंगे कि ऐसे गड्ढों के निर्माण से क्या होगा, तो जान लीजिए इन्हीं गड्ढों में सखुआ के फल से नई पौध तैयार की जा रही है। वही ग्रामीणों के इस पहल ने जल संरक्षण के साथ- साथ मिट्टी के कटाव को भी रोक दिया है। देश- दुनिया में झारखंड की पहचान हरे- भरे जंगलों के प्रदेश के तौर पर होती है। प्रकृृति की पूजा इस राज्य की संस्कृृति का अहम हिस्सा है। ऐसे में जंगल का संरक्षण हर एक झारखंडी का दायित्व बनता है। रांची जिले के बेड़ो प्रखंड का लमकाना गांव इन दिनों अपने इसी दायित्व निर्वहन को लेकर चर्चा में है। श्रमदान के जरिए प्रकृृति को बचाने के लिए गांव के हर घर से एक व्यक्ति इस भीड़ में शामिल है। लमकाना में ग्राम सभा की बैठक के दौरान ये फैसला लिया गया कि गांव के जंगल को खुद के दम पर बचाना और बढ़ाना है। स्थानीय निवासी राजेश सहाय के अनुसार इस निर्णय के बाद गांव के लोह कुदाल और फावड़ा लेकर जंगल की ओर कूच कर गए। उन्हें किसी सरकार या सरकारी मदद का इंतजार ना कभी था और ना कभी होगा। अगर सरकार साथ देती है तो बेहतर है। वरना गांव के लोग खुद जंगल बचाने के लिए काफी हैं। लमकाना गांव का ए जंगल रैयती जमीन पर तैयार किया गया है। करीब 15 एकड़ में फैले इस जंगल से गांव के हर व्यक्ति को अपार प्रेम है। सखुआ के फल को जंगल की जमीन पर ही जमींदोज करने के लिए गांव वालों ने एक तरीका आजमाया। बारिश के पानी में सखुआ का फल बह कर जंगल से दूर ना चला जाए, इसलिए पूरे जंगल में गांव वालों ने श्रम दान से गड्ढे बना दिए। अब इन्हीं गड्ढों में गिर कर सखुआ की नई पौध तैयार हो रही है। गांव के बाल कृृष्णा उरांव बताते हैं कि जंगल में छोटे पौधों की रखवाली के लिए गांव के ही दो लोगों को जिम्मेदारी दी गई है। इस एवज में गांव के हर घर से 20 किलो धान इन दो लोगों को दिया जाता है, ताकि उनके परिवार का भरण पोषण हो सके। ग्राम प्रधान परनु भगत बताते हैं कि लमकाना में पिछले साल भी बगैर सरकारी मदद के जंगल को बचाने की मुहिम चलाई गई थी।