असम का अपने पड़ोसी राज्यों के साथ चल रहा सीमा विवाद काफी पुराना है। स्पष्ट सीमांकन नहीं होने के कारण इसको लेकर समय-समय पर टकराव की स्थिति बनती रहती है। कुछ महीने पहले असम-मिजोरम सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद यह मामला फिर से सुर्खियों में आ गया है। मिजोरम के बाद अरुणाचल, नगालैंड तथा मेघालय के साथ भी सीमा विवाद को लेकर छिटपुट घटनाएं हुईं। पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ सीमा विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। वर्तमान विवाद के बाद असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर इसे द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाने के लिए पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री डॉ. शर्मा ने मेघालय के साथ सर्वप्रथम इसके लिए विभिन्न स्तरों पर वार्ता शुरू की। दोनों राज्यों में मुख्यमंत्रियों की सहमति से तीन क्षेत्रीय समितियों का गठन किया गया था। मालूम हो कि असम-मेघालय के बीच बारह जगहों पर सीमा विवाद है। सर्वप्रथम दोनों राज्यों ने छह जगहों - हाहिम, गिजांग, ताराबाड़ी, बोकलापाड़ा, खानापाड़ा-पिलिंगकाटा एवं राताचेरा का विवाद सुलझाने के लिए पहल की है। क्षेत्रीय समितियों की रिपोर्ट के आधार पर दोनों राज्यों के मंत्रियों एवं अधिकारियों के स्तर पर कई बैठकें चलीं। इसके बाद में यह निर्णय लिया गया है कि दोनों ही राज्य ले-देकर इस समस्या का समाधान निकालेंगे। ऐसी खबर है कि कुल 36.79 वर्ग किलोमीटर विवादित भूमि का 18.51 वर्ग किलोमीटर जमीन असम को मिलेगा तथा तथा बाकी 18.28 वर्ग किलोमीटर जमीन मेघालय के हिस्से में जाएगी। विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि सीमांकन निर्धारण के दौरान असम और मेघालय की ऐतिहासिक स्थिति, स्थानीय लोगों आबादी एवं उनकी राय तथा प्रशासनिक सुविधा आदि का पूरा ध्यान रखा जाएगा। सीमावर्ती क्षेत्र में जहां गारो एवं खासी आबादी ज्यादा है उस क्षेत्र को मेघालय को दिया जाएगा। जिन क्षेत्रों में असमिया एवं अन्य जनजातीय लोग रहते हैं उसे असम के हिस्से में दिया जाएगा। दोनों ही राज्यों द्वारा इस मामले को अब केंद्रीय गृह मंत्रालय को अंतिम अनुमति के लिए भेजा जा रहा है। उसके बाद दोनों राज्यों को इसे कानूनी जामा पहनाना पड़ेगा। लेकिन इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री शर्मा द्वारा मंगलवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में विपक्षी दलों खासकर कांग्रेस तथा एआईयूडीएफ ने इस पर अंतिम सहमति से पहले विधानसभा का सत्र बुलाने की मांग की है। दोनों पार्टियों का कहना है कि यह मामला सीधे जनता से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस पर व्यापक विचार-विमर्श करने की जरूरत है। विपक्षी पार्टियां नहीं चाहती हैं कि यह मामला दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के स्तर पर ही सुलझ जाए। सीमा विवाद के समाधान के दौरान इस बात की भी व्यवस्था करनी होगी कि भविष्य में असम और मेघालय इसके खिलाफ फिर कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाएं। इसलिए पूरी तरह से लागू करने से पहले हर तरह के विकल्पों पर विचार करना जरूरी है। अगर यह मामला आम सहमति से सुलझ जाता है तो असम-मेघालय के बाकी छह विवादित जगहों का मामला भी सुलझ सकेगा। यह पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है। दूसरे राज्य भी सीमा विवाद का हल ढूंढ़ने के लिए आगे आ सकते हैं। वर्तमान पहल के लिए असम और मेघालय दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री प्रशंसा के पात्र हैं। अगर वास्तव में पूर्वोत्तर के राज्यों के बीच सीमा विवाद की समस्या का हल हो जाए तो पूर्वोत्तर में विकास की गति काफी तेज हो जाएगी।