नई दिल्ली : सरकारी तेल कंपनियों की मुनाफाखोरी एक बार फिर हमारी जेब पर भारी पड़ रही है। दिसंबर में कच्चे तेल (क्रूड) के दाम घटे। उसी हिसाब से कंपनियां दाम घटातीं तो पेट्रोल 8 रुपए और डीजल 7 रुपए/लीटर सस्ता होता। दिवाली से ठीक पहले केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 5 रुपए/ लीटर, जबकि डीजल पर 10 रुपए/लीटर घटाई थी। ज्यादातर राज्यों ने भी वैट घटाया। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों में थोड़ी कमी आई। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में कमी आनी शुरू हो गई। क्रूड नवंबर के 80.64 डॉलर के मुकाबले दिसंबर में 73.30 डॉलर/प्रति बैरल रहा। देश में पेट्रोल-डीजल के दाम रोज तय होते हैं। ऐसे में जब दाम घटाने की बारी आई तो सरकारी कंपनियां लोगों को राहत देने के बजाए मुनाफाखोरी में जुट गईं। रेटिंग एजेंसी इक्रा के वाइस प्रेसिडेंट और पेट्रोलियम मामलों के विशेषज्ञ प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं- कीमतों की समीक्षा का उद्देश्य था कि क्रूड की कीमतों में तेजी आए तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ें, क्रूड सस्ता हो तो दाम घटें। कई बार सियासी कारणों से दाम कम किए जाते हैं, जिसकी भरपाई कंपनियां बाद में करती हैं। तेल कंपनियों आईओसीएल, बीपीसीएलऔर एचपीसीएल के सितंबर तिमाही के नतीजों को देखें तो इनका कर पूर्व मुनाफा प्री-कोविड लेवल से 20 गुना तक बढ़ा है।