पैसे कमाने के लिए अपने घर को छोड़कर दूसरे राज्य या दूसरे देश में जाना कोई नई बात नहीं है। खासतौर पर बिहार या उत्तर प्रदेश के लिए यह आम बात है। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव मेंं पलायन एक चुनावी मुद्दा जरूर था, परंतु लोगों ने इस समस्या को दूर करने के लिए वोट नहीं दिया। परिणाामत: पलायन को रोकने की बात करने वाले प्रशांत किशोर की पार्टी एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। दूसरी ओर इस मुद्दे को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भी जोर-शोर से उठाया, परंतु राजद नेता तेजस्वी यादव अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। इस चुनाव में एनडीए की जीत हुई क्योंकि उनके शासनकाल में कई तरह की नि:शुल्क योजनाएं चलाई जा रही हैं और इससे संबंधित पाॢटयों का प्रदर्शन बेहतर रहा। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इस चुनाव में नीतीश कुमार का जादू खूब चला और वे लगातार दसवीं बार सीएम के पद पर पहुंचने में सफल रहे। उल्लेखनीय है कि बिहार और अन्य ङ्क्षहदीभाषी प्रदेशों के लिए पलायन कोई नई बात नहीं है। यह सिलसिला लगातार जारी है। इस विषय पर आदिकाल में अब्दुल रहमान ने संदेश रासक लिखा और पलायन के कारण दांपत्य जीवन में आने वाली समस्या पर प्रकाश डाला। दूसरी ओर भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर ने बिदेसिया के बैनर तले नाटक भी रचा, जो काफी लोकप्रिय हुआ और बाद में इस पर फिल्म भी बनी। इस समस्या पर किसी शायर का कहना है-पोंछ डालो अपनी आंखों के आंसू, देखो रेलगाड़ी आ रही है, तुझे छोड़कर मैं हरगिज न जाता, गरीबी मुझे लेकर जा रही है। इन बातों से प्रवासन की पीड़ा को समझा जा सकता है। भारत में प्रवासन कोई नया सामाजिक-आर्थिक तथ्य नहीं है, बल्कि दशकों से यह स्रोत राज्यों और गंतव्य राज्यों दोनों की राजनीति और नीतियों को प्रभावित करता आया है। बावजूद इसके प्रवासन को समझने के लिए हमारी नीतिगत और सांख्यिकीय दृष्टि अब भी पुरानी धारणाओं पर टिकी हुई है।राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) की ओर से आखिरी समर्पित प्रवासन सर्वेक्षण 2007-08 में हुआ था। वह समय स्मार्टफोन, गिग-इकॉनॉमी, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार और जलवायु परिवर्तन से जुड़े विस्थापन के आगमन से काफी पहले का था। तब से लेकर अब तक भारत का श्रम बाजार नई वास्तविकताओं से पूरी तरह बदल चुका है। ऐसे में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा वर्ष 2026-27 में व्यापक प्रवासन सर्वेक्षण करवाने का प्रस्ताव अत्यंत समयोचित और जरूरी कदम है। प्रवासन दरों के विश्वसनीय अनुमान, लोगों के स्थानांतरण के कारण, धन प्रेषण (रेमिटेंस)और प्रवासियों के अनुभवों से जुड़े आंकड़े नीति-निर्माण की सबसे बड़ी कमी दूर कर सकते हैं। अब तक जनगणना और एनएसएस के सीमित मॉड्यूल इस दिशा में कुछ जानकारी देते रहे हैं, परंतु ये साधन एक तेजी से बदल रहे परिदृश्य की केवल झलक ही पकड़ पाते हैं। आज प्रवासन स्थायी स्थानांतरण से लेकर कुछ हफ्तों या महीनों की अल्पकालिक आवाजाही तक फैला हुआ है, विशेषकर निर्माण, कृषि, लॉजिस्टिक्स और आतिथ्य जैसे क्षेत्रों में। 2020-21 के एनएसएस बहु संकेतक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 29.1 प्रतिशत भारतीययानी हर 10 में 3 प्रवासी हैं। शहरी क्षेत्रों में यह अनुपात बढ़कर 34.6 प्रतिशत हो जाता है। पुरुषों में 11.4 प्रतिशत और महिलाओं में 47.7 प्रतिशत ने प्रवास किया, जिनमें महिलाओं का प्रमुख कारण विवाह था, जबकि पुरुषों में लगभग 48.8 प्रतिशत प्रवासन रोजगार के लिए हुआ। आंकड़े बताते हैं कि भारत में ज्यादातर आवाजाही स्थानीय स्तर पर होती है-करीब 87 प्रतिशत प्रवासन एक ही राज्य के भीतर और 58.5 प्रतिशत एक ही जिले के भीतर। लेकिन जब रोजगार संबंधी प्रवासन की बात आती है तो तस्वीर बदल जाती है-काम की तलाश में जाने वाले लगभग 40 प्रतिशत लोग दूसरे राज्यों में जाते हैं, जबकि विवाह संबंधी प्रवासन में यह अनुपात मात्र 5 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि श्रमिकों का लंबी दूरी तक जाने वाला प्रवासन अपेक्षाकृत कम है लेकिन आर्थिक कारणों से होने वाला प्रवासन अधिक दूरी तक फैला हुआ है। दिक्कत यह है कि प्रवासी जिन वास्तविक चुनौतियों का सामना करते हैं-चाहे वह आवास हो, स्वास्थ्य, असंगठित क्षेत्र में असुरक्षा हो या सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच-वे प्रशासनिक डेटा में अक्सर दिखती ही नहीं। अधिकांश प्रवासी श्रमिक अपनी कठिनाइयां दर्ज नहीं कराते और अफसरशाही की निगरानी से बाहर रहते हैं। इसके साथ ही भारत के राज्यों के बीच प्रवासन में भारी असमानताएं भी मौजूद हैं। हिमाचल प्रदेश, केरल, तेलंगाना, पंजाब और महाराष्ट्र जैसे राज्य बड़ी संख्या में प्रवासियों को आकर्षित करते हैं, जो उनके शहरीकरण और आर्थिक गतिविधियों के स्तर को दर्शाता है। दूसरी ओर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में बाहर जाकर काम कमाने की पुरानी परंपरा अब भी जारी है। हाल में हुए बिहार चुनावों में भी इस वास्तविकता ने राजनीतिक विमर्श को मजबूर किया, जहां दलों को बाहर काम करने वाले लाखों श्रमिकों की आकांक्षाओं पर बात करनी पड़ी। प्रस्तावित सर्वेक्षण इन खाइयों को भरने की कोशिश करता है। अब देखना है कि इस क्षेत्र में सरकार कितना कामयाब होती है।
प्रवासन सर्वेक्षण