डोनाल्ड ट्रंप की ओर से बढ़ते प्रतिबंधों की धमकियों के बावजूद भारत और चीन रूसी तेल कंपनियों के साथ व्यापार जारी रखे हुए हैं। आलोचक कहते हैं कि रूस इस आय का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध के लिए कर रहा है, लेकिन भारत और चीन दोनों का कहना है कि उनका यह व्यापार वैध है और उनकी राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों पर आधारित है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भरोसा दिलाया कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा, हाालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता अस्थिर वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारतीय उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है। भारत और चीन दोनों रूस के लिए ऊर्जा बाजार के अहम साझेदार बन चुके हैं। 2021 से 2024 के बीच भारत की रूस से तेल खरीद 19 गुना बढ़कर एक लाख से 19 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गई। चीन का आयात भी 50 प्रतिशत बढ़कर 24 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया। रूस के लिए भारत दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया, जिससे उसे सस्ते दामों पर तेल मिल सका और देश ने 2022 से 2024 के बीच लगभग 33 अरब डॉलर की बचत की। भारत का कहना है कि सस्ता रूसी तेल खरीदना उसकी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जो संतुलित संबंधों पर आधारित है चाहे वह अमरीका हो, रूस या चीन। हालांकि ट्रंप प्रशासन भारत पर दबाव बढ़ा रहा है। पहले ही 25 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद अगस्त में कुछ भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क घोषित किया गया। इसका सीधा असर भारत की तेल खरीद लागत पर पड़ा,जो लगभग 11 अरब डॉलर तक बढ़ सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि अमरीका सेकेंडरी प्रतिबंध लगाता है तो भारतीय कंपनियों की अमरीकी वित्तीय प्रणाली तक पहुंच सीमित हो सकती है। इससे वैश्विक बैंकिंग, शिपिंग और रिफाइनिंग सेक्टर पर भी असर पड़ेगा। रूस की अर्थव्यवस्था पहले से ही भारी दबाव में है। उसका रक्षा खर्च जीडीपी के छह प्रतिशत से ऊपर जा चुका है और वास्तविक महंगाई दर 15-20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। ऐसे में नई पाबंदियां वैश्विक ऊर्जा कीमतों को अस्थिर कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूस का लगभग 50 लाख बैरल प्रतिदिन का तेल बाजार से हट जाता है तो तेल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं। ओपेक देशों की उत्पादन क्षमता सीमित होने के कारण इतनी बड़ी कमी की भरपाई संभव नहीं है। भारत की स्थिति इस परिदृश्य में नाजुक है। यदि उसे रूसी तेल पर निर्भरता घटानी पड़ी तो वैकल्पिक स्रोत ढूंढने में कम से कम एक साल लग सकता है। कीमतें बढ़ने पर भारत और दुनिया दोनों में महंगाई बढ़ेगी। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से अमरीका और भारत दोनों में लगभग 0.2 प्रतिशत महंगाई बढ़ जाती है। यदि कीमतें मौजूदा 58 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110-120 डॉलर तक पहुंचती हैं तो महंगाई में एक प्रतिशत तक की अतिरिक्त वृद्धि संभव है। दूसरी ओर चीन का रुख कुछ अलग है। उसका रूस से तेल आयात वैध करार दिया गया है और वह अमरीकी दबाव को एकतरफा धौंस कहकर खारिज कर रहा है। हालांकि कुछ चीनी बैंक पहले ही रूसी लेन-देन से पीछे हटने लगे हैं, फिर भी बीजिंग अपने ऊर्जा हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है। चीन की रेयर अर्थ मेटल्स पर पकड़ उसे अमरीका के साथ वार्ता में एक ताकत देती है, जबकि भारत के पास ऐसा कोई प्रभावशाली औजार नहीं है। ट्रंप का दावा है कि उनकी नई पाबंदियां रूस और भारत की कमजोर होती अर्थव्यवस्थाओं को झटका देंगी। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी नीति किसी देश के पक्ष या विरोध में नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और किफायती दाम सुनिश्चित करने पर केंद्रित है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल के अनुसार अमरीका और भारत के बीच ऊर्जा सहयोग को और मजबूत करने की बातचीत चल रही है। भले ही अब रूसी तेल पर मिलने वाली छूट पहले जैसी नहीं रही, भारतीय रिफाइनरियां अभी भी बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल खरीद रही हैं, जून में यह 20.8 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो भारत के कुल तेल आयात का 44 प्रतिशत है। साफ है कि जब तक सस्ता तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता रहेगा, रूस से व्यापार पूरी तरह बंद होने की संभावना बहुत कम है।
भारत-रूस तेल व्यापार