गाजापट्टी में दो वर्षों तक चला विनाशकारी युद्ध आखिरकार एक संघर्ष विराम की घोषणा के साथ थम गया है। इस संघर्ष विराम के लागू होते ही, शनिवार को लाखों फिलीस्तीनी नागरिक अपने टूटे-फूटे, बर्बाद घरों की ओर लौटने लगे। यह वापसी किसी जीत की नहीं, बल्कि जिंदा रहने की जिद और अपनी जड़ों से फिर जुड़ने की कोशिश का प्रतीक है। युद्ध ने न केवल बुनियादी ढांचे को मिट्टी में मिला दिया है, बल्कि लोगों की जिंदगियों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है। ऐसे में यह संघर्ष विराम महज एक अस्थायी शांति नहीं, बल्कि नए सवालों और चुनौतियों की भी शुरुआत है। खान यूनिस, जो गाजा का दूसरा सबसे बड़ा शहर है,वहां भी इसी तरह की वापसी देखी जा रही है। लोग मलबे में अपने मरे हुए प्रियजनों के अवशेष खोज रहे हैं,लकड़ी और धातु के टुकड़ों को ईंधन की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और टूटी हुई दीवारों को ही आश्रय मानकर फिर से जीने की कोशिश कर रहे हैं। इजरायली सेना संघर्ष विराम के तहत धीरे-धीरे गाजा सिटी और खान यूनिस से पीछे हट रही है, लेकिन फिलीस्तीनियों को चेतावनी दी गई है कि वे सेना की गतिविधियों में हस्तक्षेप न करें। इसका सीधा अर्थ यह है कि संघर्ष विराम के बावजूद हालात संवेदनशील हैं, और किसी भी उकसावे से युद्ध फिर से भड़क सकता है। इस संघर्ष विराम के पीछे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी भूमिका है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की 20-बिंदुओं वाली शांति योजना के तहत यह समझौता संभव हो पाया है। योजना में हमास को निशस्त्र करना, गाजा में एक ट्रांजिशनल अथॉरिटी की स्थापना करना और एक अंतर्राष्ट्रीय शांति सेना की तैनाती जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। यह सेना अरब और मुस्लिम देशों के सैनिकों से बनी होगी और गाजा के भीतर सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाएगी। हालांकि हमास ने इसे विदेशी हस्तक्षेप बताते हुए नकार दिया है, जिससे स्पष्ट है कि शांति प्रक्रिया में अब भी कई बाधाएं मौजूद हैं। मानवीय संकट सबसे गंभीर चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता एजेंसियों के अनुसार, अब तक $गाज़ा में सिर्फ 20 प्रतिशत राहत सामग्री ही पहुंच पाई है। जॉर्डन और मिस्र जैसे देशों से भेजी गई 1,70,000 मीट्रिक टन राहत सामग्री अब भी वितरण की राह देख रही है। कुपोषण, बीमारी और असुरक्षा ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। संघर्ष के दौरान भोजन और दवाइयों पर लगी पाबंदियों के चलते हजारों लोग भुखमरी का शिकार हुए। आज जब फिलीस्तीनी अपने घरों की ओर लौट रहे हैं, तो वे एक नई शुरुआत करने जा रहे हैं - मलबे के बीच उम्मीद की एक नई ईंट रखने। लेकिन यह काम अकेले उनका नहीं है। यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह सिर्फ हथियार बंद कराने तक सीमित न रहे, बल्कि पुनर्निर्माण, न्याय और आत्मनिर्णय के अधिकार को भी प्राथमिकता दे। यह संघर्ष विराम आखिरी नहीं होगा, अगर गाजा की जनता को आत्मसम्मान और स्थिरता का जीवन नहीं दिया गया। एक स्थायी समाधान तभी संभव है जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ मानवीय करुणा भी हो। यही इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है-ताकि गाजा दोबारा जले नहीं, बल्कि जी उठे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सीजफायर के बाद फिलीस्तीनियों में जीने की ललक उत्पन्न हो गई है। भूख, बमबारी और विनाश की गाथा को समेटे फिलीस्तीनी अपने घरों की ओर इसलिए आ रहे हैं ताकि फिर से नई ङ्क्षजदगी शुरू की जाए। वैसे भी इंसान अंतिम समय तक जीने की जुगत करता है। यह उसके स्वभाव का हिस्सा है। अंतिम समय तक संघर्ष और अपने सपनों को संजोने के लिए हर कोई कोशिश करता है। कोशिश से कामयाबी तक का सफर आसान नहीं होता, परंतु बहुत ही सुखद होता है जो स्मृतियों में संजोकर रखा जाता है। फिलीस्तीन के लोग जीने की उम्मीद छोड़ चुके थे। उनके हजारों लोग इस युद्ध की भेंट चर चुके है। जब वे अपने घरों को लौट रहे हैं तो उनकी नजरों के सामने एक वीभत्स भरी ङ्क्षजदगी है। परंतु उम्मीद है कि संकट की यह घड़ी तुरंत दूर हो जाएगी। फिलहाल पूरी दुनिया उनके साथ है। सांत्वना के लिए यही काफी है।
फिर से जीने की आस