लगातार हो रही मॉनसून की बारिश के चलते उत्तर भारत में भीषण बाढ़ के हालात बन गए हैं और भूस्खलन की कई घटनाएं भी हो रही हैं। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक इन घटनाओं में करीब 90 लोगों की मौत हो चुकी है और लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। भारत के हिमालयी क्षेत्र में स्थित उत्तराखंड, हिमाचल-प्रदेश और जम्मू-कश्मीर को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इनके अलावा, पंजाब में भी बाढ़ ने जमकर तबाही मचाई है। राज्य के सभी 23 जिलों के 1,400 से ज्यादा गांव बाढ़ की चपेट में आए हैं। तीन लाख से ज्यादा लोग भारी बारिश और बाढ़ की वजह से प्रभावित हुए हैं। पंजाब की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर रहती है। बाढ़ के चलते करीब 1.5 लाख हेक्टेयर खेत पानी में डूब गए हैं और फसलें बर्बाद हो गई हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान में अधिकारियों ने बताया कि 10 लाख से अधिक लोगों को बाढ़ग्रस्त इलाकों से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। पाकिस्तान के पूर्व में स्थित पंजाब प्रांत में बाढ़ ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। जून के आखिर में मानसून की शुरुआत से लेकर अब तक पाकिस्तान में बाढ़ के चलते 800 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। दक्षिण एशियाई क्षेत्र, दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है और यह जलवायु परिवर्तनों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील भी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि अब बारिश संबंधी आपदाएं ज्यादा आ रही हैं और उनकी तीव्रता भी बढ़ रही है, ऐसे में इस क्षेत्र को इन आपदाओं से निपटने के लिए अपनी तैयारी बेहतर करनी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि मॉनसून की अनिश्चितता के पीछे जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख कारण हो सकता है। वे कहते हैं कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन दक्षिण एशिया के मॉनसून को तीव्र कर रहा है। पहले जिन बारिशों का अनुमान लगाया जा सकता था, वे अब अनियमित हो गई हैं। कई बार बेहद कम समय के भीतर बहुत अधिक बारिश होती है और बाद में सूखा पड़ जाता है। भारत में हिमालयी क्षेत्र 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैला हुआ है, इनमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्य शामिल हैं। मॉनसून के दौरान इन इलाकों को अधिक प्राकृृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। जानकार बताते हैं कि अब हम एक गर्म दुनिया में रह रहे हैं, जो औद्योगिक काल से पहले की तुलना में लगभग 1.5 डिग्री अधिक गर्म है। वे यह भी कहते हैं कि भविष्य में अत्यधिक बारिश की घटनाओं की संख्या और तीव्रता में बढ़ोतरी ही होगी। तेजी से हो रहे शहरीकरण, जंगलों की कटाई और उचित योजना के बिना खड़े किए गए बुनियादी ढांचे ने बाढ़ की स्थिति और गंभीर कर दी है। उन्होंने आगे कहा कि पानी निकलने की प्राकृृतिक प्रणालियां नष्ट हो गई हैं। नदियों का कुप्रबंधन हो रहा है। जब भारी बारिश और ऐसी कमजोरियां आपस में मिलती हैं तो आपदाओं को टालना नामुमकिन हो जाता है। जानकार बताते हैं कि अगर बारिश समान रूप से बंटी हुई होती है तो आप पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता है, लेकिन मान लीजिए कि अगर पूरे महीने की बारिश कुछ घंटों या कुछ दिनों में ही हो जाती है तो उससे समस्याएं पैदा होती हैं। फिलहाल हम यही होता देख रहे हैं। पाकिस्तान में बाढ़ में जिंदा बचे शख्स ने कहा कि ऐसा लगा जैसे मौत घूर रही है। पाकिस्तान में मूसलाधार बारिश के कारण अचानक आई बाढ़ ने कम-से-कम 344 लोगों की जान ले ली। अब भी कई शव मलबे में दबे हंै। मॉनसून जरूरत भी है और कहर भी। इमरजेंसी इवेंट्स डेटाबेस के मुताबिक साल 2024 में अकेले एशिया में ही 167 आपदाएं आई थीं, जो किसी भी महाद्वीप के लिए सबसे ज्यादा हंै। शोधकर्ताओं ने पाया कि तूफान, बाढ़, लू और भूकंप की घटनाओं के कारण 32 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। जानकार बताते हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़नी तय है, इसलिए देशों को इनसे निपटने के लिए अधिक तैयारी करने की जरूरत है। वे आगे चिंता जताते हुए कहते हैं कि फिलहाल भारत में इस बारे में कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं है कि भविष्य में इन चीजों को कैसे संभाला जाएगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मनुष्य के सामने कई तरह की परेशानियां सामने आ रही हैं और प्राकृृतिक आपदाओं की वजह से बाढ़, भूस्खलन और नदियों में भूकटाव की समस्या बढ़ रही है, परंतु इन समस्याओं को रोकने में इंसान असफल है। ऐसे बड़ी संख्या में लोग असमय ही काल के गाल में समा रहे हैं। मनुष्य प्रकृृति का अंश है, उसका सारा ताना-बाना प्रकृृति से जुड़ा हुआ है। ऐसे में प्रकृृति के विभिन्न स्वरूप को विकास के नाम पर प्रभावित करना कहां की बुद्धिमता है। इस पर विचार करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
आफत की बारिश