सौभाग्यवती महिलाएं अखंड सौभाग्य की कामना के संग हरितालिका तीज का व्रत हर्ष, उमंग व उल्लास के साथ रखती हैं। कुंवारी कन्याएं भी मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं। हिन्दू धर्मशास्त्रों में भाद्रपद शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि के दिन हरितालिका तीज का व्रत रखने का विधान है। यह व्रत गौरी तृतीया के रूप में भी जाना जाता है। हरितालिका तीज के दिन व्रत व उपवास रखकर प्रथम पूज्यदेव भगवान श्रीगणेशजी के साथ ही भगवान् शिव तथा भगवती पार्वती जी की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना करती हैं। इस बार यह व्रत 6 सितंबर, शुक्रवार को रखा जाएगा। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि भाद्रपद शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि 5 सितंबर, गुरुवार को दिन में 12 बजकर 22 मिनट पर लगेगी जो कि 6 सितंबर, शुक्रवार को दिन में 3 बजकर 02 मिनट तक रहेगी। हस्त नक्षत्र 5 सितंबर, गुरुवार को प्रातः 6 बजकर 15 मिनट से 6 सितंबर, शुक्रवार को प्रातः 9 बजकर 25 मिनट तक रहेगा, तत्पश्चात् चित्रा नक्षत्र संपूर्ण दिन रहेगा। शुक्ल योग 5 सितंबर, गुरुवार की रात्रि 9 बजकर 08 मिनट से 6 सितंबर, शुक्रवार की रात्रि 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। 6 सितंबर, शुक्रवार को हरितालिका तीज का व्रत-पर्व मनाया जाएगा। ऐसी मान्यता है कि व्रत को विधि-विधान पूर्वक करने पर महिलाओं का सौभाग्य अखंड रहता है। व्रत का पारण चतुर्थी तिथि के दिन किया जाता है। ज्योतिषविद् के अनुसार व्रत के एक दिन पूर्व भोजन करके दूसरे दिन संपूर्ण दिन निर्जला निराहार (बिना कुछ ग्रहण किए) रहा जाता है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान के पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता के पूजनोपरान्त हरितालिका तीज के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। व्रत वाले दिन व्रती महिलाएं अपने हाथों में मेंहदी रचाकर सोलह शृंगार करती हैं। आजकल राशि एवं जन्मतिथि के अनुसार भी परिधान के रंगों का चयन करने का रिवाज प्रचलन में है। पूजा का विधान : ज्योतिषविद् ने बताया कि पूजा के अन्तर्गत मिट्टी या रजत-सुवर्णादि धातु से निर्मित शिव-पार्वतीजी की मूर्ति का पंचोपचार, दशोपचार तथा षोडशोपचार पूजा करने का विधान है। भगवान् शिव व भगवती पार्वती के साथ ही सुख-समृद्धि के दाता श्रीगणेशजी की भी पूजा-अर्चना करते हैं।
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