पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता गुवाहाटी : असम सरकार और मेघालय की शैक्षणिक संस्था यूएसटीएम के बीच टकराव इस बार चरम पर पहुंच गया है। असम सरकार ने 28 साल बाद जालसाजी करके जाति प्रमाण पत्र इकट्ठा करने के आरोप में यूएसटीएम के मालिक और कुलाधिपति महबुबुल हक के खिलाफ मामला दर्ज करने की तैयारी की है। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने घोषणा की कि करीमगंज जिला प्रशासन ने धोखाधड़ी करके 1992 में अन्य पिछड़ा वर्ग के जाति प्रमाण पत्र एकत्र करने के लिए यूएसटीएम के कुलाधिपति महबुबुल हक के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की तैयारी की है। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत ने बुधवार को दिसपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि हम लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि यूएसटीएम का मालिक एक शिक्षाविद् है, लेकिन करीमगंज के डीसी की ओर से एक रिपोर्ट आई है कि उन्होंने धोखाधड़ी से ओबीसी सर्टिफिकेट हासिल किया था और उनका प्रमाणपत्र करीमगंज जिला आयुक्त द्वारा पहले ही रद्द कर दिया गया था। क्या फर्जीवाड़े से ओबीसी प्रमाणपत्र हासिल करने वाला व्यक्ति कभी शिक्षाविद हो सकता है? उन्होंने किरेण समुदाय के सदस्य के रूप में ओबीसी प्रमाणपत्र लिया था। फिर लोगों ने उनके खिलाफ आरोप लगाए। तब करीमगंज के जिला आयुक्त ने सबकी बात सुनने के बाद इन सज्जन का ओबीसी सर्टिफिकेट खारिज कर दिया। डीसी ने उनका सर्टिफिकेट तो खारिज कर दिया, लेकिन उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज नहीं कराई। सीएम ने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा नकली प्रमाणपत्र प्राप्त करने के बाद अगले कदम में उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराना चाहिए। तब एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी, लेकिन अब हम एफआईआर दर्ज कराएंगे। मैं अब कमिश्नर से एफआईआर दर्ज कराने के लिए कहूंगा। जो लोग यूएसटीएम को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, वे बिना जाने खुद के साथ देश का नुकसान कर रहे हैं। गौरतलब है कि करीमगंज के जिला आयुक्त ने 27 अगस्त 2024 को पत्र संख्या ई 49712/डीएफए2892891 द्वारा मुख्यमंत्री के प्रधान निजी सचिव को इस संबंध में विवरण भेजा। पत्र में कहा गया है कि करीमगंज जिले के पाथरकांडी थाने के पुरबगोल गांव के दिवंगत इब्राहिम अली के बेटे महबुबुल हक ने 24 अगस्त 1992 को ऐसा प्रमाण पत्र लिया था। जाति प्रमाण पत्र पर करीमगंज के तत्कालीन आयुक्त द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। हालांकि, प्रमाणपत्र नकली पाए जाने पर 20 अगस्त 1996 को अस्वीकार कर दिया गया था। इसका मतलब यह है कि सर्टिफिकेट रद्द करने के 28 साल बाद असम सरकार महबुबुल हक के खिलाफ जांच की तैयारी कर रही है।