अमरीकी शोध एवं निवेश फॉर्म हिंडनबर्ग रिसर्च की नवीनतम रिपोर्ट के बाद भारत में सियासी माहौल गर्म है। विपक्षी पार्टियों ने तुरंत रिपोर्ट को हथियार बनाते हुए सरकार पर आरोपों की बौछार लगा दी है। विपक्षी पार्टी के नेताओं का कहना है कि इस पूरे मामले में नरेन्द्र मोदी सरकार की संलग्नता है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) प्रमुख माधवी पुरी बूच और उनके पति धवल बूच की अडाणी समूह से जुड़े विदेशी कोष में हिस्सेदारी है, जिसका इस्तेमाल अडाणी समूह में धन की कथित हेराफेरी के लिए किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार बूच और उनके पति ने बरमूडा और मारिशस में अस्पष्ट विदेशी कोष में अघोषित निवेश किया था। यह वही कोष है जिसका कथित तौर पर विनोद अडाणी ने पैसों की हेराफेरी करने और समूह की कंपनियों के शेयरों की कीमतें बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया था। विनोद अडाणी अडाणी समूह के चेयरमैन गौतम अडाणी के बड़े भाई हैं। हिंडनबर्ग ने जनवरी 2023 में जारी अपनी पिछली रिपोर्ट में अडाणी समूह पर वित्तीय लेन-देन में गड़बड़ी और शेयरों की कीमतें चढ़ाने के लिए विदेश कोष के दुरुपयोग के आरोप लगाये गए थे। हालांकि अडाणी समूह ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि वह नियामकीय प्रावधान का पालन करता है। हिंडनबर्ग की ताजा रिपोर्ट के बाद एक बार फिर यह मुद्दा विवाद में आ गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि अडाणी समूह के खिलाफ कार्रवाई करने में पूंजी बाजार नियामक सेबी की अनिच्छा का कारण सेबी प्रमुख और उनके पति की अडाणी समूह से जुड़े विदेशी कोष में साझेदारी हो सकती है। पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त पैनल को बताया गया था कि वह 13 अस्पष्ट निकायों की जांच कर रहा है, जिनके पास समूह के पांच सार्वजनिक रूप से कारोबार किये जाने वाले शेयरों में 14-20 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसी खबर है कि इन जांचों में से अंतिम जांच अब पूरी होने वाली है। बूच दंपति ने हिंडनबर्ग के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद बताया है। जनवरी 2024 में उच्चतम न्यायालय द्वारा अडाणी समूह के खिलाफ लगाये गए पहले के आरोपों को खारिज कर दिया गया था। विपक्षी पार्टियां इस मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित करने की मांग कर रही हैं। विपक्ष का यह भी कहना है कि इस रिपोर्ट के बाद माधवी पुरी बूच का इस पद पर रहना उचित नहीं है। कुल मिलाकर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद अडाणी समूह की कंपनियों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ा है। कुछ विदेशी ताकतें हिंडनबर्ग रिसर्च जैसी एजेंसियों से इस तरह की रिपोर्ट प्रकाशित करवा कर भारतीय अर्थ-व्यवस्था को कमजोर करना चाहती है। अगर सेबी प्रमुख और अडाणी समूह के बीच कोई सांठगांठ है तो इसकी जांच होनी चाहिए तथा दोषी व्यक्तियों को कानून के दायरे में लाना चाहिए। लेकिन यह मामला अगर राजनीतिक हित के लिए किया गया है तो ऐसे साजिश का पर्दापाश भी होना चाहिए। देश की विपक्षी पार्टियां जिस तरह हिंडनबर्ग की रिसर्च की रिपोर्ट पर खुल कर सामने आई है, वही पार्टियां बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों विशेषकर हिंदुओं पर हो रहे हमले पर मौन साधे हुए हैं। विपक्ष का यह दोहरा चरित्र स्वीकार्य नहीं है। बांग्लादेश में जिस तरह हिंदुओं पर जुल्म ढाये जा रहे हैं उसका जबर्दस्त विरोध होना चाहिए। भारत सहित दुनिया भर में इसके खिलाफ आवाज उठ रही है, लेकिन देश में विपक्षी नेताओं की आवाज बंद होना संदेह पैदा करता है। वोट बैंक की राजनीति राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं होता है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में अगर सच्चाई है तो दोषियों को कानून के दायरे में जरूर लाना चाहिए। ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे देश की अर्थ-व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़े।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर सियासत
