डॉ. विलास जोशी

मध्य प्रदेश के सतना जिले में हर साल ‘गधों का मेला’ लगता हैं। यहां देशभर से लोग अपने-अपने गधे लाते है और लोग भी ऊंची-ऊंची बोलियां लगाकर गधे खरीदते है। इस साल गधे खरीदने वालों की अपार भीड़ रही। इस साल गधों के मेले की खासियत यह थी कि गधों के मालिकों ने अपने-अपने गधों को फिल्मी सितारों के नाम देकर बेचा। शायद आपको यकीन नहीं आएगा, लेकिन यह सच है कि ‘सलमान’ नाम का गधा ‘एक लाख पचास हजार रुपए’ में बिका, जबकि ‘दीपिका’ नाम की गधी ‘एक लाख पच्चीस हजार रुपए’ में बिकी। फिर ‘रणबीर’नाम का गधा ‘पचास हजार’ रुपए में बिका, वही ‘ऋतिक’ नाम के गधे के लिए केवल ‘तीस हजार रुपए’ की बोली ही लगी।

विश्वास कीजिए, जिन लोगों ने गधों के नाम ‘फिल्मसितारों’ के नाम पर रखे, मुझे उनके दिमाग के दिवालियापन पर बहुत तरस आया। आप पूछेंगे कि इसमें तरस खानेवाली क्या बात है? अरे बंधुओं, गधा दुनिया का सबसे मेहनतकश जानवर है और ऐसे मेहनतकश जानवर को फिल्मीसितोरों के नाम देना, उनकी कीमत और महत्ता का ह्यस करना नहीं तो क्या हैै?अरे मेहनतकशों, अब तो जागो, ये तुम्हारे अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाने के समान है। इतिहास साक्षी है कि इन मेहनतकशों की हमेशा से ही उपेक्षा की गई है। उन्हे गधा कहके ,उन्हे व्यंग्यों का एक पात्र बनाया गया है। मुझे याद है, एक समय था,जब गधों को भी जंगल में बहुत प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उनके बूरे दिन  आने के पिछे एक कहानी है। जब जंगल में जानवरों का मंत्रिमंडल बनाया गया, तब शेर को प्रधानमंत्री का पद दिया गया। खरगोश को सूंचना प्रचार मंत्री बनाया गया और गधेराज को’ ‘उच्चशिक्षा मंत्री’। उच्च शिक्षामंत्री बनते ही गधेराजजी में ‘गधत्व’ जागा और उन्होने अपने पहले ही राष्ट्रीय प्रसारण में कहा कि-‘हम ऐसी नई शिक्षा प्रणाली  बनाएंगे कि कहीं कोई ‘उल्लू’ नजर आएगा ही नहीं’। यकीन मानिए, उनके इस  वक्तव्य पर जंगलभर में राजनीति हो गई। यह बात उल्लुओं की प्रजाति को रास नहीं आई और उन्होने तत्काल जंगल में अपनी बिरादरी की एक बैठक बुलाई और गधेराज के इस वक्तव्य का विरोध करते हुए एक प्रेस नोट जारी किया कि-‘नए उच्च शिक्षा मंत्री गधेराज जी हम उल्लुओं की सम्पूर्ण बिरादरी का नाश करना चाहते है। परिणामत हमारे बिरादरी का अस्तित्व ही खतरे में है, इसलिए इन गधेराज जी से त्यागपत्र लकर उनको तत्काल पद से हटाया जाए। प्रधानमंत्री शेर को विवश होकर गधेराजजी को मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा। उसके बाद उनकी पोस्टिंग धोबी के एक घाट पर कर दी गई। हे मेहनतकशों, तुम अपने एक बिरादर के केवल एक स्टेटमेंट  का खामिजाना भुगत रहे हो, इसलिए कहता हूं कि -हे विश्वभर के गधों, तुम एक हो जाओ। तुम मेहनतकश हो और अपने पसीने की रोटी खाते हो। तुम सब भी एक होकर, एक आवाज में कहो कि-‘हमारा नाम फिल्मसितारों के नाम पर रखना हमारा अपमान है। हम इस बात की कड़ी भर्सना करते हुए, इसका विरोध करते है। मित्रों, संभव है, तुम्हारी ताकत काम कर जाए और अगले वर्ष के  ‘तुम्हारे मेले’ में तुम्हे  ’ऐसे नामों से मुक्ति मिल जाए ?