भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में भगवान् शिवजी की महिमा अनन्त है। प्रदोष व्रत के उपास्य देवता भगवान शिव ही हैं। भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा प्राप्ति के लिए शिवपुराण में विविध व्रतों का उल्लेख मिलता है, जिसमें प्रदोष व्रत अत्यन्त प्रभावशाली तथा शीघ्र फलदाई माना गया है। चान्द्रमास के दोनों पक्षों में प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है। सूर्यास्त और रात्रि के सन्धिकाल को प्रदोष बेला कहते हैं। प्रदोष बेला की अवधि दो या तीन घटी मानी गई है, एक घटी 24 मिनट की होती है।
प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार 19 जुलाई, शुक्रवार को प्रदोष व्रत रखा जाएगा। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 18, जुलाई, गुरुवार को रात्रि 8 बजकर 45 मिनट पर लगेगी जो कि 19 जुलाई, शुक्रवार को सायं 7 बजकर 42 मिनट तक रहेगी। मूल नक्षत्र 18, जुलाई, गुरुवार को अद्र्धरात्रि के पश्चात 3 बजकर 26 मिनट से 19 जुलाई, शुक्रवार को अद्र्धरात्रि के पश्चात 2 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। प्रदोष बेला में त्रयोदशी तिथि का मान 19 जुलाई, शुक्रवार को होने के फलस्वरूप प्रदोष व्रत इसी दिन रखा जाएगा। श्रद्धा-भक्तिभाव के साथ किए गए प्रदोष व्रत से जीवन में सुख-समृद्धि, खुशहाली का सुयोग तो बनता ही है साथ ही भक्त पर शिवजी की कृपा बरसती है।
प्रदोष व्रत का विधान : विमल जैन ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त हो स्वच्छ वस्त्र धारण करके अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना के पश्चात् दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए। सम्पूर्ण दिन निराहार रहते हुए सायंकाल पुन: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर प्रदोषकाल में भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पूजा की जाती है। भगवान शिवजी को क्या करें अर्पित : भगवान शिवजी का अभिषेक करके उन्हें वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, सुगन्धित द्रव्य के साथ बेलपत्र, कनेर, धतूरा, मदार, ऋतुपुष्प, नैवेद्य आदि जो भी सुलभ हो, अर्पित करके शृंगार करना चाहिए।
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