जगन्नाथ रथ यात्रा 7 जुलाई को शुरू हो रही है। ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का बेहद भव्य आयोजन किया जाता है। हर साल यह यात्रा आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। भगवान जगन्नाथ को भी पूजा के दौरान भोग लगाया जाता है।  भगवान जगन्नाथ के लिए पूरे 56 प्रकार के भोग तैयार किए जाते हैं और फिर उसका भोग लगाया जाता है। इतना ही नहीं 56 भोग के बाद भगवान जगन्नाथ को नीम के चूर्ण का भी भोग लगाया जाता है। आइए जानते हैं आखिर भगवान जगन्नाथ को 56 भोग और नीम के चूर्ण का भोग क्यों लगाया जाता है। मान्यता है कि मैया यशोदा श्री कृष्ण को दिन में आठ बार भोजन कराती थीं। एक बार ब्रज में इंद्रदेव अतिवृष्टि कर देते हैं।  तब श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपने हाथ की छोटी उंगली से उठा लेते हैं और  ब्रजवासियों की रक्षा करते हैं। इस दौरान 7 दिन तक भगवान कृष्ण ने कुछ भी नहीं खाया था। 

श्री कृष्ण के प्रति अपना प्रेम और भक्ति दिखाते हुए माता यशोदा और ब्रजवासियों ने मिलकर 7 दिन और 8 पहर के अनुसार यानी 7 गुणे 8=56 प्रकार के व्यंजनों का भोग भगवान कृष्ण को लगाया था। तभी से श्री कृष्ण को 56 प्रकार के भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है। लेकिन भगवान जगन्नाथ को भोग लगाने के बाद नीम के चूर्ण का भोग भी लगाया जाता है। भगवान जगन्नाथ को 56 भोग लगाने के बाद नीम के चूर्ण का भोग लगाने की पीछे भी बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं। इसमें एक कथा के अनुसार पुरी के राज भगवान जगन्नाथ को 56 प्रकार के भोग लगाते थे। मंदिर से कुछ दूर एक स्त्री रहती थी, वह भगवान जगन्नाथ को ही अपना पुत्र मानती थी। वह मंदिर में जाकर भगवान को रोज भोग खाते हुए देखती थी।

एक दिन उस स्त्री के मन में यह विचार आया कि इतना सारा भोजन करने के बाद मेरे बेटे के पेट में दर्द हो जाएगा। इसलिए वह तुरंत भगवान जगन्नाथ के लिए नीम का चूर्ण बनाकर उन्हें खिलाने के लिए आई, परंतु मंदिर द्वार पर खड़े सैनिकों ने उसके हाथ से नीम का चूर्ण फेंक दिया और उसे वहां से भगा दिया। स्त्री को रोते देख भगवान जगन्नाथ ने राजा को सपने में दर्शन दिए और उन्हें आदेश दिया कि तुम्हारे सैनिक मेरी माता को मुझे दवा नहीं खिलाने दे रहे।  सपने में भगवान जगन्नाथ की बाते सुन राजा उस स्त्री के घर गए और उससे माफी मांगी। इसके बाद  स्त्री ने दोबारा नीम का चूर्ण तैयार कर भगवान जगन्नाथ को खिलाया।