इन दिनों गर्मी पड़ ही नहीं रही है, बल्कि बरस रही है, इससे आम जन-जीवन प्रभावित ही नहीं हो रही है, बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, लोग चाहकर भी मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच रहे हैं, इसका सीधा असर चुनाव प्रक्रिया पर पड़ रही है। वैसे हर बार आम चुनाव भयंकर गर्मी के मौसम में पड़ते हैं। तेज धूप होने के कारण लोग घर से निकलने से कतराते हैं क्योंकि मतदान स्थलों पर लंबी लाइन में कोई खड़ा नहीं होना चाहता, जो तपती गर्मी को मतदान में कमी की अहम वजह  है। घटते मतदान के पीछे बढ़ती गर्मी को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है।  इस समय पूर्वोत्तर भारत के तमाम इलाकों में पारा तकरीबन 39-41  डिग्री से आगे के पारा को छू चुका है। कुछ दिन पहले चुनाव प्रचार अभियान के दौरान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी गर्मी के चलते मंच पर बेहोश हो गए। करीब 98 करोड़ मतदाताओं वाले भारतीय लोकसभा चुनाव सात चरणों में हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर सभी सातों चरणों के दौरान मतदान हो रहा है जहां अप्रैल के मुकाबले अब गर्मी ज्यादा बढ़ चुकी है। बढ़ती गर्मी और हीटवेव स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अखबारों में एक आलेख लिखा है कि भारत में मौसम अनुकूल चुनाव कराए जाने का समय आ गया है और अब इससे जुड़ी संभावनाओं को तलाशा जाना चाहिए। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एक राष्ट्र-एक चुनाव पर गठित समिति के प्रमुख भी हैं। गर्मी में परेशानियों से सिर्फ मतदाता ही नहीं बल्कि मतदान स्थल पर कार्यरत पीठासीन अधिकारियों को भी दो चार होना पड़ता है।

उनका कहना है कि भीषण गर्मी में ईवीएम को लेकर आने के लिए तेज धूप में ही घंटों रहना पड़ता है। हमारी चार-पांच लोगों की टीम होती है। सभी लोग गर्मी में ईवीएम की रखवाली भी करें, अपना भी ख्याल रखें और मतदान भी सुचारु रूप से करवाएं, यह जिम्मेदारी निभाना काफी मुश्किल है। मतदान स्थल ज्यादातर सरकारी स्कूलों में बनाए जाते हैं जहां पर बिजली और पानी की बहुत उचित व्यवस्था नहीं होती है। उनकी मांग है कि सुबह से शाम तक भीषण गर्मी में रहकर मतदान करवाने वाले कर्मियों के लिए भी उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। तेज गर्मी का मौसम मुख्य रूप से उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य, पूर्व और उत्तर प्रायद्वीपीय भारत के मैदानी इलाकों में मार्च से जून के दौरान होता है। ये गर्म हवाओं का महीना होता है। बढ़ती गर्मी को देखते हुए मतदान स्थल पर भी लू से बचाव के लिए सुझाव पट्टी और कुछ अन्य व्यवस्था की सलाह भी दी गई है। मतदान स्थलों पर बुजुर्गों और गर्भवतियों के लिए बैठने की व्यवस्था और लू लगने पर पास के अस्पताल में आकस्मिक व्यवस्था का भी सुझाव दिया गया है।  लोकसभा का कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव संपन्न हो जाना जरूरी होता है। इस साल 16 जून को यह कार्यकाल समाप्त होने वाला है। ऐसे में उससे पहले चुनाव होने जरूरी है। ऐसे में हीटवेव के दौरान मतदान होने या न होने पर कोई नियंत्रण नहीं किया जा सकता। ओपी रावत कहते हैं कि पहले चुनाव फरवरी में और एक दिन पर हो जाते थे लेकिन अब सभी पार्टियों की मांग सेंट्रल पैरामिलेट्री फोर्स की होती है जो कि सीमित है।  ऐसे में कई चरणों में मतदान किए जाते हैं।

उनके मुताबिक वर्तमान में भी चुनाव फरवरी या मार्च में कराए जा सकते हैं, लेकिन सभी पार्टियों की सहमति होनी जरूरी है। 2024 में युवा मतदाताओं की संख्या भी सबसे अधिक है। ऐसे में कई लोग मानते हैं कि ई-वोटिंग भी एक विकल्प हो सकता है। इसपर रावत कहते हैं कि निर्वाचन आयोग 2015 से ही वोटिंग करवाने की कोशिश कर रहा है। तब से ही वॉलंटियरी बेसिस पर आधार और मतदाता पहचान पत्र को जोड़ने की कवायद शुरू हो गई थी और 20 करोड़ मतदाताओं का वोटर कार्ड, आधार कार्ड से लिंक हो भी गया था।  इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निजता के उल्लंघन के आधार पर यह रोक दिया गया। कोर्ट के आदेश के बाद फिर संसद से निजता के अधिकार एक्ट में जरूरी बदलाव के बाद यह प्रक्रिया शुरू की गई है।  इसका उद्देश्य यही है कि कहीं भी आधार कार्ड से मतदाता की बायोमेट्रिक पहचान सुनिश्चित कर ई-वोटिंग कराई जा सके।  हालांकि उनके मुताबिक ऐसा कोई कदम सभी पार्टियों की सहमति होने के बाद ही उठाया जा सकेगा।