पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता गुवाहाटी : राज्य सरकार ने अमृत वृक्ष आंदोलन के माध्यम से भादो महीने में 1 करोड़ पेड़ लगाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था। सरकार ने व्यापक वृक्षारोपण अभियान को पर्यावरण एवं वन विभाग की उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया, लेकिन अमृत वृक्ष अभियान कितना सफल रहा यह अब सवालों के घेरे में है। चालू सप्ताह में जहां लू के थपेड़ों के बाद लोग अपना घर छोडऩे को मजबूर हो गए वहीं अमृत वृक्ष आंदोलन की सफलता पर लोगों के मन में संशय हो रहा है। वास्तव में गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड दर्ज करने के लिए सरकार द्वारा जनता के सहयोग से लगाए गए 1 करोड़ पेड़ जीवित हैं? क्या सरकार ने भादो महीने की तपती धूप में पेड़ लगाने के लिए जो 40 करोड़ रुपए खर्च किए उसका कुछ लाभ हुआ है? भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने इससे पहले भी एनरेगा योजना के तहत गांवों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया था लेकिन हकीकत में नतीजा शून्य रहा।
आम आदमी पार्टी नेतृत्व ने शिकायत की थी कि डिब्रूगढ़ के अभयपुर में एक घंटे में 3,31,929 पेड़ लगाए गए थे लेकिन दो माह के अंदर 90 प्रतिशत पेड़ मर गए हैं। इतना ही नहीं, सरकार ने नगांव के रंगलु में 500 अमृत वृक्ष के पौधे लगाए, लेकिन उनमें से केवल 350 ही जीवित बचे हैं। बंगाईगांव वन विभाग के अंतर्गत खगड़पुर पहाड़तली नर्सरी में जो पौधारोपण किया गया था उसके अधिकांश पौधे मर गए हैं। यह तो एक उदाहरण है, लेकिन हर जिले में लगे लाखों पेड़ आज अस्तित्व में नहीं हैं। स्व-सहायता समूह की महिलाओं को जो पौधे दिए गए थे, वे अभी जीवित हैं या नहीं, इसमें भी संदेह है। गौरतलब है कि विश्व वन निगरानी परियोजना के तहत भी वन विनाश के मामले में असम अब देश में शीर्ष पर है। असम में सबसे अधिक 324 किमी हेक्टेयर जंगल का विनाश हुआ है।