चुनाव के ऐन वक्त पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री मोदी की ओर से जीवन के हरेक क्षेत्र में बदलाव की बातें कही जा रही है। निस्संदेह भारत बदल रहा है और यह भारत की महिलाओं के लिए भी बदल रहा है, परंतु बदलाव के साथ कुछ क्षेत्र में नई समस्याएं भी उत्पन्न हो गई है, जो भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति भेदभाव की ओर से इंगित करता है। आंकड़े बताते हैं कि कुछ मामलों में महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है। भारत की जनसंख्या में महिलाओं का औसत बढ़ा है। साल 2023 में प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की आबादी 933 थी,जबकि 2015 में यह आंकड़ा मात्र 918 था। पिछले 10 वर्षों में भारत में महिला साक्षरता दर में इजाफा हुआ है। माध्यमिक स्तर तक शिक्षा पाने वाली लड़कियों की संख्या भी 2020 में करीब 78 फीसदी हो गई थी, जो 2015 में 75 फीसदी थी। उच्च शिक्षा में भी महिलाओं और पुरुषों के अनुपात में सुधार हुआ है।
हालांकि, यहां अब भी महिलाओं के साथ सामाजिक भेदभाव जारी है। भारत में आर्थिक मामले में भी महिलाओं और पुरुषों में काफी भेदभाव दिखता है। आमतौर भारतीय पुरुष समान पद पर काम कर रही महिला से 23 गुना ज्यादा सैलरी पाते हैं। हालांकि 2019 में यह आंकड़ा 33 फीसदी था और पिछले वर्षों में इसमें सुधार दिखा है। वैसे फिलहाल बेहद खराब स्थिति वाले भारत के रोजगार बाजार में महिलाओं की स्थिति बद से बदतर हो रही है। वैसे सरकार रोजगार लाने और आर्थिक तरक्की की बहुत बातें कर रही है, लेकिन नौकरियां कहां हैं? हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी कि जो ज्यादा पढ़े-लिखे हैं, उनके लिए नौकरियां खोजना ज्यादा मुश्किल हो रहा है। कई सालों से हम बात कर रहे हैं कि कैसे हमें साक्षरता दर को बढ़ाना है, पढ़ाई को बढ़ाना है, लेकिन बात तो यह है कि नौकरियां हैं कहां? नौकरियां नहीं हैं।
चाहे महिलाओं के लिए हों या पुरुषों के लिए। और जाहिर है कोविड के दौरान हमने देखा था कि महिलाओं ने पुरुषों से कहीं ज्यादा नौकरियां खोई थीं और वे फिर नौकरियों में लौट भी नहीं पाई थीं। तो वे महिलाएं ही होती हैं, जो किसी भी तरह की त्रासदी में ज्यादा प्रभावित होती हैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक अगर भारत की वर्कफोर्स में शामिल महिलाओं की संख्या को दोगुना कर दिया जाए, तो देश की जीडीपी ग्रोथ 9 फीसदी हो जाएगी। अभी भारत में सिर्फ 7.5 फीसदी महिलाएं किसी तरह का रोजगार करती है। सरकार और प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी इस बदलाव में तेजी ला सकती है, लेकिन भारत में लोकसभा में अभी महिलाओं की हिस्सेदारी 15 फीसदी से भी कम है और राज्यसभा में उनकी संख्या सिर्फ 14 फीसदी है। राज्यों की विधानसभाओं में करीब 10 फीसदी महिलाएं हैं। इसके अलावा ग्राम पंचायतों के 31 लाख में से 14 लाख पदों पर भी महिलाएं हैं। महिलाओं का नेतृत्व करने वाले पदों पर पहुंचना जरूरी है।
वह कहती हैं, लीडरशिप की बात सिर्फ पॉलिटिकल लीडरशिप की नहीं होती है। हर तरह की संस्थाओं में लीडरशिप की बात होनी चाहिए। चाहे कॉरपोरेट की बात करें, यूनिवर्सिटी की, स्कूल की या कॉलेजों की। बीएचयू में आज तक एक महिला चांसलर नहीं आई है। जेएनयू ने उस चीज को अभी ठीक किया है। महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने के वादों और दावों के बीच उनकी सुरक्षा आज भी एक चुनौती है। पिछले दस वर्षों में कई सांसदों और विधायकों पर भी रेप और महिलाओं के शोषण के आरोप लग चुके हैं। अभी गोंडा से बीजेपी के सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह पर महिला पहलवानों के शोषण के आरोप में केस चल रहा है, जबकि उन्नाव में बीजेपी के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर रेप के आरोप में जेल काट रहे हैं।
हाल ही में कर्नाटक में एक बड़े सेक्स स्कैंडल का खुलासा हुआ, जिसमें सांसद प्रज्ज्वल रेवन्ना पर सैकड़ों महिलाओं के यौन शोषण का आरोप है। इन दिनों भारतीय समाज में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है और जानकार इसे राजनीति से जोड़कर देखते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मोदी के शासनकाल में महिला सशक्तिकरण को कुछ हद तक बढ़ावा मिला है, परंतु कुछ क्षेत्र में काफी सुधार की आवश्यकता है।