पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता गुवाहाटी : सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को राज्य के हिरासत शिविरों में रखे गए 17 विदेशियों को तत्काल प्रत्यार्पण करने का आदेश दिया। केंद्र सरकार को दिए गए निर्देश में कहा गया है कि हम किसी अवैध विदेशी को अनिश्चित काल तक हिरासत शिविरों में नहीं रख सकते। फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने जिन 17 विदेशियों को विदेशी घोषित किया था, उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला नहीं है। उनमें से चार ने दो साल से अधिक समय हिरासत शिविरों में भी बिताया है।

न्यायमूर्ति एएस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने केंद्र सरकार को उक्त चार व्यक्तियों के प्रत्यर्पण को प्राथमिकता देने और विदेशी के रूप में पहचाने गए सभी लोगों को बिना किसी देरी के वापस भेजने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने असम कानूनी सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रस्तुत एक रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार को दो महीने के भीतर प्रत्यार्पण पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इस संबंध में अगली सुनवाई 26 जुलाई को होगी। उल्लेखनीय है कि राज्य में हिरासत शिविरों में सुविधाओं का निरीक्षण करने के लिए 2020 में राजुबाला दास द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 30 अप्रैल को असम कानूनी सेवा प्राधिकरण को राज्य में हिरासत शिविरों का दौरा करने और एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

निर्देश में पहले उन लोगों की एक सूची तैयार करने को कहा गया, जिन्होंने दो साल से अधिक समय तक हिरासत शिविरों में बिताया था। इस संबंध में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने एक समिति का गठन किया और समिति ने 14 मई को अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी। समिति बाद में हिरासत शिविरों की सुविधाओं पर एक और रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाली है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां ने केंद्र सरकार से यह जानना चाहा कि क्या विदेशियों के निर्वासन के लिए भारत का पड़ोसी देशों के साथ कोई प्रत्यर्पण समझौता है।

उन्होंने कहा कि न्यायाधिकरण के निर्णय के बाद कि कोई व्यक्ति विदेशी है, सरकार का अगला कदम क्या होगा? क्या भारत का पड़ोसी देशों के साथ प्रत्यर्पण समझौता है? विदेशी के रूप में पहचाने जाने वाले लोगों को हिरासत शिविरों में अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को दो महीने के भीतर हलफनामे के तहत सौंपी जाने वाली प्रत्यर्पण रिपोर्ट में इन सभी मुद्दों का उल्लेख करने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा, मामले को हल्के में लीजिए। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि सरकार विदेशियों की मेजबानी करती रही है। लेकिन हिरासत शिविरों के बजाय उन्हें बहुत पहले ही उनके देशों में वापस भेज दिया जाना चाहिए था। विदेशियों को खाना खिलाने पर खर्च होने वाला पैसा हम भारतीय नागरिकों की कल्याण योजनाओं पर खर्च कर सकते थे।