बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है। हमारे देश में बेरोजगारी के अनेक कारण हैं। अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है। देश के 90 प्रतिशत किसान अपूर्ण या अर्द्ध बेरोजगार हैं जिनके लिए वर्ष भर कार्य नहीं होता है। वे केवल फसलों के समय ही व्यस्त रहते हैं। यदि हम बेरोजगारी के कारणों का अवलोकन करें तो हम पाएंगे कि इसका सबसे बड़ा कारण देश की निरंतर बढ़ती जनसंख्या है। हमारे संसाधनों की तुलना में जनसंख्या वृद्धि की गति कहीं अधिक है जिसके फलस्वरूप देश का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2023 की चौथी तिमाही के दौरान इसमें 8.4 फीसदी वृद्धि हुई, लेकिन अर्थव्यवस्था में होने वाली यह वृद्धि उन लाखों युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां पैदा करने में संघर्ष कर रही है, जो हर साल श्रम बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। इस समस्या का एक कारण यह है कि पिछले कुछ दशकों में अधिकांश वृद्धि भारत के सेवा क्षेत्र के विस्तार की वजह से हुई है, जो कि विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में उतने रोजगार नहीं पैदा कर पाती है। जानकार बताते हैं कि समावेशी विकास के लिए जरूरी है कि तेजी से नौकरियां न सिर्फ  उन्हें मिले जो वेतन और कौशल वितरण के शीर्ष पर हैं, बल्कि उन्हें भी मिले जो सबसे निचले स्तर पर हैं। भारत में बेरोजगारी हर तरफ है। यहां तक कि कॉलेज ग्रेजुएट्स भी बड़ी संख्या में बेरोजगार हैं। हालांकि, कृृषि और निर्माण क्षेत्र में नौकरियां काफी हैं, लेकिन इन क्षेत्रों में उतने कुशल श्रमिक नहीं मिल पा रहे हैं जितनी उम्मीद की जाती है, यही वजह कि नव शिक्षित वर्ग श्रम क्षेत्र की मांगों को पूरा नहीं कर पा रहा है। यानी उन क्षेत्रों में नौकरियां भी हैं और नौकरी चाहने वाले भी, लेकिन काम के हिसाब से योग्यता और कौशल की कमी है। हाल ही में इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट और इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन ने इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट-2024 जारी किया है। यह रिपोर्ट भी भारत में रोजगार की स्थिति को बहुत गंभीर रूप में पेश करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जो बेरोजगार कार्यबल है, उनमें लगभग 83 फीसद युवा हैं। कुल बेरोजगार भारतीयों में माध्यमिक या उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की हिस्सेदारी साल 2000 में जहां 35.2 फीसद थी, वो साल 2022 में लगभग दोगुनी यानी 65.7 फीसद हो गई है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में युवा बेरोजगारी दर अब वैश्विक स्तर से कहीं ज्यादा है। भारतीय अर्थव्यवस्था नए शिक्षित युवाओं के लिए गैर-कृृषि क्षेत्रों में पर्याप्त रोजगार पैदा करने में सक्षम नहीं है, जो बढ़ती बेरोजगारी दर में दिखता है। भारत में लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। 19 अप्रैल से शुरू होकर छह हफ्ते तक सात चरणों में चुनाव होने वाले हैं। जाहिर है कि युवाओं में इतनी ज्यादा बेरोजगारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के लिए एक बड़ी परेशानी है। मोदी प्रशासन ने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन को अपने अभियान का मुख्य हिस्सा बनाया है। पिछले तीन वर्षों में सरकार ने अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और रोजगार पैदा करने के तौर पर सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाया है।  इन तमाम प्रयासों के बावजूद युवाओं के लिए रोजगार सृजन अपर्याप्त है जो कि आईएचडी/आईएलओ की रिपोर्ट से पता चल रहा है। अर्थशास्त्री कहते हैं कि बेरोजगारी एक बहुआयामी समस्या है।  विभिन्न मोर्चों पर नीतिगत कार्रवाई की जरूरत है, यह मूल रूप से एक आर्थिक पक्ष है, लेकिन इसके कई सामाजिक और राजनीतिक आयाम भी हैं।  पिछले तीन दशक में शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ भारतीय कार्यबल ज्यादा शिक्षित हुआ है, लेकिन उनके लिए नौकरियां ज्यादा नहीं बढ़ी हैं। यही कारण है कि शिक्षित युवाओं के लिए बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा बन गई है। भारत जैसे बड़ी युवा आबादी वाले देश में जहां 65 फीसद भारतीयों की उम्र 35 वर्ष से कम होने का अनुमान है, वहां निश्चित तौर पर बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है। नौकरियों का संकट महिलाओं को खासतौर पर प्रभावित करता है। आईएलओ और आईएचडी की रिपोर्ट में बताया गया है कि शिक्षित बेरोजगार युवाओं में पुरुषों (62.2 प्रतिशत) की तुलना में महिलाओं की हिस्सेदारी कहीं ज्यादा (76.7 प्रतिशत) है।  रिपोर्ट के मुताबिक भारत उन देशों में से एक है जहां महिला श्रम बल भागीदारी दर दुनिया में सबसे कम, करीब 25 फीसदी है। भारत में शिक्षितों खासकर महिलाओं के बीच बेरोजगारी एक महत्वपूर्ण समस्या है।