इन दिनों पूरा भारत चुनावी बुखार की गिरफ्त में है। आम चुनाव की घोषणा के बाद विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी ने कई तरह के सवाल खड़े किए हैं और मतदाताओं के बीच एक सवाल बार-बार कौंध रहा कि आम चुनाव के वक्त दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी कितनी सही है ? इन गिरफ्तारियों ने विपक्ष को सतर्क कर दिया है और अब लग रहा है कि कई टूट-फूट के बाद फिलहाल इंडिया अलायंस में टूट की संभावना नहीं है। आमतौर पर देखा जाए तो पिछले साल 2023 में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद इस गठबंधन में काफी बिखराव देखा गया और इसको बनाने वाले नीतीश कुमार ने इसे अलविदा कहकर भाजपा के साथ गठबंधन कर लिया था, उसके बाद ममता बनर्जी के रुख में भी काफी बदलाव आया उसने विपक्ष को काफी निराश किया। इसी कड़ी में विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समर्थन में खड़ा हो गया है। भ्रष्टाचार के मामले में अदालत ने उन्हें 15 अप्रैल तक न्यायिक हिरासत में भेजा है।
दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़े आरोपों को लेकर आम आदमी पार्टी (आप)के अन्य नेताओं के अलावा पार्टी प्रमुख केजरीवाल को मार्च में गिरफ्तार किया गया था। भारत में आम चुनाव 19 अप्रैल से 1 जून तक चलेंगे। इसके लिए पार्टियों का चुनावी अभियान जोरों पर चल रहा था कि केजरीवाल गिरफ्तार कर लिए गए। आप का कहना है कि केजरीवाल पर लगे आरोप बीजेपी के विरोधियों को कुचलने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीति प्रेरित हथकंडा है। फरवरी में आप ने इंडिया गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया था। फरवरी में आप ने इंडिया गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया था।
इंडिया ब्लॉक की अगुवाई भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस कर रही है, जो चुनावों में बीजेपी को एक विश्वसनीय चुनौती देने को तत्पर है। गठबंधन में दर्जनों राजनीतिक दल शामिल हैं, लेकिन आप और कांग्रेस का दबदबा सबसे ज्यादा है। पिछले दिनों नई दिल्ली में हुई लोकतंत्र बचाओ रैली में विपक्षी नेताओं ने नरेंद्र मोदी पर भारत की संघीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इल्जाम लगाया कि बीजेपी चुनावों को अपने पक्ष में फिक्स करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन चुनावों में मैच फिक्सिंग की कोशिश कर रहे हैं।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों, मैच फिक्सिंग, सोशल मीडिया और प्रेस पर दबाव डाले बिना वो 180 से ज्यादा सीटें जीत ही नहीं सकते। वैसे भी रैली से पता चलता है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी ने किस तरह विपक्षी पार्टियों में नई ऊर्जा भर दी है। सवाल उस आबकारी नीति की खासियतों या गुणों का नहीं है, जिसकी वजह से केजरीवाल गिरफ्तार किए गए। ऐन चुनावों के वक्त पर उनकी गिरफ्तारी की टाइमिंग राजनीतिक प्रक्रिया को नष्ट और समान भागीदारी के अवसर को ध्वस्त कर देती है। विपक्षी दलों के लिए बड़ा सवाल यह है कि केजरीवाल का मामला मतदाताओं में सहानुभूति जगाएगा या नहीं। दिल्ली महानगर भारत के उन चुनिंदा हिस्सों में से है, जहां बीजेपी को बढ़त हासिल नहीं है। पिछले दशक से मतदाताओं ने विधानसभा चुनावों में आप का समर्थन किया।
वे केजरीवाल की कल्याणकारी राजनीति पसंद करते हैं, जिसके तहत आप की सरकार अच्छी गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूलों, परिष्कृत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और मुफ्त बिजली का वादा पूरा कर रही है। हालांकि संसदीय चुनावों में आप का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। अब देखना है कि बदलती राजनीति में दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर किस गठबंधन को जीत मिलती है क्योंकि पिछले पांच सालों में दिल्ली की राजनीति काफी बदली है और बदलती राजनीति ने मतदाताओं पर काफी असर डाला है।